सहारनपुर मस्जिद टूटने पर भड़के अरशद मदनी! बोले- 'संविधान और समान कानून...'
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सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित एक प्राचीन मस्जिद को तोड़े जाने के मामले ने अब राजनीतिक और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है.
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे बेहद दुखद बताया है.
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि इस घटना से संविधान, कानून और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं.
मदनी ने कहा कि अगर देश में कानून सभी लोगों और समुदायों के लिए बराबर है तो उसके इस्तेमाल में अलग-अलग मापदंड नहीं होने चाहिए.
उन्होंने आरोप लगाया कि बुलडोजर की कार्रवाई कई मामलों में न्याय से ज्यादा बदले और भेदभाव की राजनीति जैसी दिखाई देने लगी है.
सहारनपुर कलेक्ट्रेट में स्थित प्राचीन मस्जिद का ध्वस्तीकरण अत्यंत अफसोसजनक है। इस कार्रवाई ने एक बार फिर यह बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर संविधान और कानून सभी के लिए समान हैं तो उनके लागू करने में दोहरा मापदंड क्यों दिखाई देता है?
आज बुलडोजर न्याय की निशानी कम और बदले, Arshad Madani (@ArshadMadani007) September 5, 2026
मस्जिद के रिकॉर्ड और जमीन को लेकर क्या दावा है?
अरशद मदनी ने अपने बयान में दावा किया कि संबंधित मस्जिद वक्फ बोर्ड में दर्ज है और उसका वक्फ नंबर 451 है.
उन्होंने यह भी कहा कि पुराने जमीन रिकॉर्ड में याकूब खान और वहीद खान के नाम दर्ज बताए जाते हैं.
मदनी के मुताबिक, मस्जिद कमेटी ने अदालत के सामने 1911 से जुड़े दस्तावेज, नगरपालिका रिकॉर्ड और पुराने राजस्व अभिलेख भी पेश किए थे.
उनका कहना है कि इतने पुराने दस्तावेजों और कानूनी दावों के बावजूद मस्जिद को गिराए जाने की कार्रवाई पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
हालांकि, इन रिकॉर्ड और कानूनी दावों की अंतिम स्थिति संबंधित न्यायिक और प्रशासनिक रिकॉर्ड से ही स्पष्ट होगी.<
📡 स्रोत: ABP Live
💡 पृष्ठभूमि (Background)
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित प्राचीन मस्जिद को तोड़ने की घटना ने सामाजिक और राजनीतिक चर्चा को तेज कर दिया है। यह विषय धार्मिक स्थलों के संरक्षण और कानून के पालन से जुड़ा है। खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संविधान, समान कानून और धार्मिक स्वतंत्रता के मूलभूत सिद्धांतों पर सवाल उठाती है। यदि ऐसे कार्य आगे बढ़े तो यह समाज में विभाजन बढ़ा सकता है, धार्मिक समुदायों के बीच अविश्वास पैदा कर सकता है और कानूनी ढांचे पर भरोसे को कमजोर कर सकता है। जनता को यह चेतावनी देता है कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धर