सैलरी बढ़ने के 1 घंटे बाद धरने से हटे पंचायत-सचिव:लखनऊ में खाली हुआ इको गार्डन, सरकार ने मानदेय 6 से 9 हजार किया
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →लखनऊ में पंचायत सहायकों का 10 दिन से चल रहा आंदोलन खत्म हो गया है। योगी सरकार ने उनका मानदेय 3 हजार रुपए बढ़ा दिया है। अब पंचायत सहायकों को हर महीने 6 हजार की जगह 9 हजार रुपए मिलेंगे। सरकार के फैसले एक घंटे के बाद ही पूरा इको गार्डन खाली हो गया। हजारों की संख्या में पूरे प्रदेश से आए प्रदर्शनकारी वापस चले गए हैं। पंचायत सचिव लखनऊ में 7 सितंबर से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे थे। 3 तस्वीरें देखिए...
प्रदेश में 58 हजार से ज्यादा पंचायत सहायक पंचायत सहायकों के प्रतिनिधिमंडल की ओर से दिए गए ज्ञापन के मुताबिक प्रदेश के सभी 75 जिलों में 58,672 पंचायत सहायक हैं। पंचायत सहायक ग्राम पंचायत स्तर पर काम करते हैं। आंदोलनकारियों का दावा था कि एक पंचायत सहायक के साथ उसका परिवार, रिश्तेदार और गांव का सामाजिक दायरा भी जुड़ा है।
इसी आधार पर संगठन से जुड़े लोगों ने प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में 25 से 30 हजार वोट प्रभावित करने का दावा किया था। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए सरकार भी उनके आगे झुकने को मजबूर हो गई। पंचायत सचिवों की प्रमुख मांगे- 403 विधायकों को पत्र भेजने का दावा पंचायत सहायकों का कहना है कि अपनी पांच सूत्रीय मांगों को लेकर वे उत्तर प्रदेश के सभी 403 विधायकों को पत्र भेज चुके हैं।
इसके जरिए उन्होंने सत्ता पक्ष के साथ विपक्षी विधायकों तक भी अपनी मांग पहुंचाने की कोशिश की है। आंदोलनकारियों का कहना है कि इसके बाद भी समाधान नहीं निकलने के कारण उन्हें लखनऊ में अनिश्चितकालीन धरना शुरू करना पड़ा। अब विपक्षी नेताओं की लगातार मौजूदगी से आंदोलन की राजनीतिक अहमियत भी बढ़ रही है।
टोलियों में बंटे थे, भजन-कीर्तन के बीच गुजर रही थी रात इको गार्डेन में आंदोलन को लंबा चलाने के लिए पंचायत सहायक पूरी व्यवस्था से आये थे। प्रदर्शनकारी अलग-अलग टोलियों में बैठ थे। धरनास्थल पर भजन-कीर्तन के साथ विरोध दर्ज करा रहे थे। आंदोलनकारी भूजा, चटनी-रोटी और सामान्य भोजन के सहारे दिन-रात धरनास्थल पर डटे थे।
पंचायत सहायक नवनीत का कहना है कि मांगें पूरी नहीं होने पर भी वे धरना छोड़ने वाले नहीं हैं। उन्होंने कहा, “हम गांधीवादी हैं, हम यहीं बैठेंगे।” नवनीत का सवाल है कि छह हजार रुपये महीने में आखिर किसी कर्मचारी का परिवार कैसे चल सकता है। उन्होंने सत्ता के साथ विपक्ष से भी सवाल किया। नवनीत का कहना है कि अगर पंचायत सहायकों की समस्या इतनी गंभीर है तो विपक्ष को भी इसे ज्यादा मजबूती से उठाना चाहिए।
आधी रात को इको गार्डेन पहुंचीं पल्लवी पटेल आंदोलन में सोमवार देर रात उस समय नया घटनाक्रम सामने आया, जब अपना दल (कमेरावादी) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और सिराथू विधायक पल्लवी पटेल रात करीब 12 बजे इको गार्डेन पहुंचीं। आंदोलनकारियों के मुताबिक उन्हें सूचना मिली थी कि धरनास्थल पर फोर्स बढ़ाई जा रही है और प्रदर्शनकारियों को हटाया जा सकता है।
इसके बाद वह रात में धरनास्थल पहुंचीं और सुबह करीब चार बजे तक पंचायत सहायकों के बीच रहीं। पल्लवी पटेल ने आंदोलनकारियों से कहा कि वे धैर्य बनाए रखें और संगठित तरीके से आंदोलन जारी रखें। उन्होंने पंचायत सहायकों को जिलों के हिसाब से अलग-अलग टोलियों में बांटकर आंदोलन चलाने का सुझाव भी दिया।
‘अगर हमारा भविष्य नहीं, तो इनके भविष्य पर भी सोचेंगे’ पल्लवी पटेल ने अपने संबोधन में आंदोलन को चुनावी राजनीति से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि सरकार पंचायत सहायकों और आम लोगों के वोट से बनी है। उन्होंने आंदोलनकारियों से कहा कि यदि उनके वर्तमान और भविष्य की चिंता नहीं की गई तो वे भी राजनीतिक भविष्य को लेकर अपना फैसला कर सकते हैं।
उन्होंने प्रदर्शनकारियों को भरोसा दिलाया कि जब भी वे आवाज देंगे, वह उनके साथ खड़ी रहेंगी। पल्लवी पटेल ने अधिकारियों को लेकर भी बेहद तीखी भाषा का इस्तेमाल किया और पंचायत सहायकों के खिलाफ कार्रवाई होने पर विरोध करने की बात कही। संजय सिंह भी पहुंचे, विपक्ष की बढ़ रही मौजूदगी इस आंदोलन में विपक्षी नेताओं की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है।
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह भी पंचायत सहायकों के बीच पहुंचे। उन्होंने छह हजार रुपये के मानदेय को लेकर सरकार पर सवाल उठाते हुए इसे बढ़ाकर 30 हजार रुपए करने की मांग का समर्थन किया और पंचायत सहायकों की आवाज संसद में उठाने की बात कही। पंचायत सहायकों का प्रतिनिधिमंडल सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से भी मिलकर ज्ञापन सौंप चुका था।
प्रतिनिधिमंडल ने उनके सामने नियमितीकरण और मानदेय बढ़ाने समेत अपनी मांगें रखी थीं। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले क्यों अहम था आंदोलन?
पंचायत सहायकों के आंदोलन का चुनावी प्रभाव अभी मापना संभव नहीं है, लेकिन तीन बातें इसे राजनीतिक रूप से अहम बनाती हैं। पहला, आंदोलनकारियों के मुताबिक उनकी मौजूदगी प्रदेश के सभी 75 जिलों में है। दूसरा, उनका काम सीधे ग्राम पंचायत स्तर पर होने के कारण ग्रामीण आबादी से नियमित संपर्क रहता है। तीसरा, विपक्षी दलों के नेता अब खुले तौर पर धरनास्थल पहुंचकर उनकी मांगों का समर्थन कर रहे हैं।
📡 स्रोत: NewsData.io