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SIR में नाम कटा, तो घर जाकर दस्तावेज लेंगे अफसर: विवाद के बाद चुनाव आयोग का फैसला; अब तक 30 राज्य-UT में 13.37 करोड़ नाम कटे

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 6 अक्टूबर 2026 👁️ 19 बार पढ़ा गया
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
SIR में नाम कटा, तो घर जाकर दस्तावेज लेंगे अफसर:  विवाद के बाद चुनाव आयोग का फैसला; अब तक 30 राज्य-UT में 13.37 करोड़ नाम कटे

सप्ताहांत में नई दिल्ली के चुनाव आयोग मुख्यालय में विशेष इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, तथा दो अन्य चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी उपस्थित थे; इस बैठक में SIR के तहत कटे हुए मतदाता नामों की पुनः सूचीबद्धता की प्रक्रिया और समय‑सीमा तय की गई।

बैठक के दौरान बताया गया कि अब तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 13.37 करोड़ नाम हटाए गए हैं, जिससे कुल 97.98 करोड़ मतदाताओं में लगभग 14% नाम कटे हैं। इस बड़े पैमाने के कटौती को लेकर कई राज्य में विवाद उत्पन्न हुए हैं, विशेषकर दिल्ली और महाराष्ट्र में जहाँ मतदाता नामों के पुनः जोड़ने के लिए क्लेम और ऑब्जेक्शन की अंतिम तिथि क्रमशः 30 अक्टूबर 2026 और 10 नवंबर 2026 तक बढ़ा दी गई है।

चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि जिन मतदाताओं के नाम SIR में कटे हैं, वे फॉर्म‑6 के माध्यम से पुनः नामांकन के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए प्रत्येक ब्लॉक के अधिकारी घर‑घर जाकर प्रभावित मतदाताओं से आवश्यक दस्तावेज़ एकत्र करेंगे और उन्हें आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करेंगे, जिससे रीजनल इलेक्टोरल ऑफिसर निर्धारित समय के भीतर निर्णय ले सकेगा।

गोवा में विशेष व्यवस्था की गई है; वहाँ के ब्लॉक अधिकारी सीधे घर‑घर जाकर फॉर्म‑6 एकत्र करेंगे, जिससे स्थानीय स्तर पर पुनः नामांकन की प्रक्रिया तेज़ होगी। आयोग ने यह भी कहा कि फॉर्म‑6 के संबंध में कोई विवाद नहीं है और सुप्रीम कोर्ट ने इस फॉर्म को बरकरार रखने का आदेश दिया है, जिससे इस कदम की वैधता स्पष्ट हुई।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति और SIR से जुड़ी कुछ पत्राचार को लेकर विवाद को बढ़ाया था। आयोग ने इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा कैबिनेट सचिव को भेजा गया पत्र SIR या आयोग के किसी निर्णय से संबंधित नहीं था, बल्कि चुनाव पैनल में प्रतिनिधित्व पर आए एक अधिकारी के कार्य‑प्रणाली से जुड़ा था।

कांग्रेस ने इस विवाद को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर मनमानी करने का आरोप लगाया और दो अन्य आयुक्तों की बात न सुनने का आरोप लगाया। कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार को हटाने और उनकी गिरफ्तारी की मांग करते हुए देशभर में प्रदर्शन आयोजित किए, जबकि विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे को राजनीतिक मंच पर उठाया।

सुप्रीम कोर्ट में भी SIR से संबंधित कुछ आदेशों और संभावित सॉफ्टवेयर बदलावों को लेकर याचिकाएँ दायर की गई हैं। अदालत ने अभी तक इन याचिकाओं पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है, परंतु यह स्पष्ट है कि न्यायिक प्रक्रिया इस विवाद को और जटिल बना रही है।

इस बीच, चुनाव आयोग ने अपनी प्रक्रिया की वैधता पर बल दिया और कहा कि सभी दस्तावेज़ एकत्रित होने के बाद रीजनल इलेक्टोरल ऑफिसर द्वारा निष्पक्ष निर्णय लिया जाएगा। आयोग ने यह भी कहा कि फॉर्म‑6 के माध्यम से नाम जोड़ने की प्रक्रिया में कोई तकनीकी या कानूनी बाधा नहीं होगी, और सभी चरणों को पारदर्शी रूप से लागू किया जाएगा।

विचारधारा के इस टकराव के सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव स्पष्ट हैं: मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर कटौती से कई नागरिकों को मतदान का अधिकार छीनने का खतरा उत्पन्न हुआ है, जिससे चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। साथ ही, राजनीतिक दलों के बीच बढ़ती टकराव ने प्रशासनिक कार्यवाही को और जटिल बना दिया है, जिससे आगामी चुनावों की तैयारी में देरी और अनिश्चितता बढ़ी है।

अंत में, चुनाव आयोग ने कहा कि SIR के तहत कटे हुए नामों की पुनः सूचीबद्धता के सभी कदम निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरे किए जाएंगे और किसी भी वैध अपील को उचित रूप से सुना जाएगा। भविष्य में यदि कोई अतिरिक्त विवाद उत्पन्न होता है, तो आयोग न्यायिक मार्गदर्शन के साथ त्वरित समाधान प्रदान करने का आश्वासन देता है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अखंडता बनी रहे।

📡 स्रोत: Dainik Bhaskar

💡 पृष्ठभूमि (Background)

विशेष इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूची से 13.37 करोड़ नाम कटने के बाद चुनाव आयोग ने नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक की। इस बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य आयुक्तों ने कटे हुए नामों की पुनः सूचीबद्धता की प्रक्रिया और समय‑सीमा तय की। यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे लाखों मतदाताओं का मतदान अधिकार प्रभावित हो रहा है। यदि नाम सही नहीं किए गए तो चुनाव में भाग लेने का अवसर खो सकता है, जिससे चुनावी भागीदारी और लोकतंत्र की वैधता पर असर पड़ेगा।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।