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सुभाष चंद्रा केस में NCLT के आदेश पर रोक:₹22 हजार करोड़ के दावों पर 6.5 करोड़ के पेमेंट की मंजूरी मिली थी; 5-सदस्यीय बेंच ने रोक लगाई

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 1 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
सुभाष चंद्रा केस में NCLT के आदेश पर रोक:₹22 हजार करोड़ के दावों पर 6.5 करोड़ के पेमेंट की मंजूरी मिली थी; 5-सदस्यीय बेंच ने रोक लगाई

NCLT की 5-सदस्यीय बेंच ने जी ग्रुप के फाउंडर सुभाष चंद्रा के ₹6.25 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को मंजूरी देने वाले 25 अगस्त के आदेश पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने सुभाष चंद्रा पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी किसी भी संपत्ति को बेचने या ट्रांसफर करने पर रोक लगा दी है। सभी संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी किया है।

यह NCLT के इतिहास में पहली बार है, जब पांच सदस्यीय बेंच बनाई गई है। बेंच की अध्यक्षता प्रेसिडेंट जस्टिस अनूपिंदर सिंह ग्रेवाल कर रहे हैं। इसके बाकी सदस्य बचु वेंकट बालाराम दास, महेंद्र खंडेलवाल, अतुल चतुर्वेदी और रविंद्र चतुर्वेदी हैं। जानिए सवाल-जवाब में पूरी खबर...

सवाल 1. NCLT की 5 जजों की बेंच ने क्या फैसला सुनाया है? जवाब: 5-सदस्यीय बेंच ने सुभाष चंद्रा के ₹6.25 करोड़ वाले रीपेमेंट प्लान की मंजूरी पर तुरंत रोक लगा दी है। इसके अलावा कोर्ट ने सुभाष चंद्रा पर अपनी कोई भी संपत्ति बेचने या ट्रांसफर करने पर पाबंदी लगा दी है। मामले से जुड़े सभी पक्षों को नोटिस जारी किए गए हैं।

सवाल 2. रीपेमेंट प्लान पर रोक लगाने की वजह क्या है? जवाब: ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि 25 अगस्त को आया फैसला जजों के स्पष्ट बहुमत से नहीं बना था। मामले की सुनवाई करने वाले तीनों सदस्यों की राय अलग-अलग थी, इसलिए उस आदेश को वैध नहीं माना जा सकता। सवाल 3. सुभाष चंद्रा पर कितना कर्ज है और उन्होंने क्या ऑफर दिया था?

जवाब: सुभाष चंद्रा पर बैंकों और वित्तीय संस्थानों का कुल ₹22,006.57 करोड़ का कर्ज बकाया है। इस भारी-भरकम कर्ज के बदले उन्होंने सिर्फ ₹6.25 करोड़ चुकाने का प्रस्ताव दिया था, जिसका बैंक लगातार विरोध कर रहे थे। सवाल 4. पांच जजों की बड़ी बेंच बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?

जवाब: मामले में सुनवाई कर रहे 2 मूल जजों और बाद में शामिल किए गए तीसरे सदस्य, तीनों की राय एक-दूसरे से पूरी तरह अलग थी। जब फैसले में कोई बहुमत नहीं बन सका, तो NCLT प्रेसिडेंट ने 5 जजों की विशेष बेंच का गठन किया। सवाल 5. मूल बेंच के जजों की राय में क्या मतभेद थे?

जवाब: पहले जज (अशोक कुमार भारद्वाज): वे केवल सहमति देने वाले लेनदारों के लिए प्लान मंजूर करने के पक्ष में थे। दूसरे सदस्य (रीना सिन्हा पुरी): इन्होंने प्रक्रिया में कमियां बताकर प्लान को पूरी तरह खारिज कर दिया था। तीसरे सदस्य (निलेश शर्मा): इन्होंने कुछ बदला

📡 स्रोत: Dainik Bhaskar

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