Tata Sons विवाद में नया मोड़, ट्रस्ट के कहने पर वोट नहीं दे सकते डायरेक्टर? जस्टिस नरीमन की राय से बढ़ी हलचल
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Tata Group में चल रहे गवर्नेंस विवाद के बीच एक पुरानी कानूनी राय फिर चर्चा में आ गई है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर.एफ.
नरीमन ने अप्रैल 2025 में अपनी राय दी थी और कहा था कि टाटा ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर सिर्फ ट्रस्ट के निर्देश मानकर वोट नहीं दे सकते हैं. उन्हें कंपनी के डायरेक्टर के तौर पर अपना खुद का फैसला लेना होगा.
अब ये राय एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है जब टाटा संस और उसके सबसे बड़े शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स के बीच चेयरमैन एन.
चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति और कंपनी की प्रस्तावित लिस्टिंग को लेकर विवाद बढ़ गए हैं.
क्या है पूरा मामला? 17 सितंबर 2026 को टाटा संस की बोर्ड बैठक में एन.
चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए फिर चेयरमैन बनाने और कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट करने का फैसला लिया गया. लेकिन टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इन फैसलों का विरोध किया.
वहीं टाटा ट्रस्ट्स के दूसरे नॉमिनी डायरेक्टर वेनु श्रीनिवासन ने इस प्रस्ताव का समर्थन कर दिया है.
यहीं से विवाद और ज्यादा बढ़ गया.
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के मुताबिक ऐसे फैसलों के लिए ट्रस्ट के नॉमिनी डायरेक्टरों का आपसी समर्थन होना चाहिए था और दोनों डायरेक्टरों का एक साथ समर्थन नहीं मिला बस इसलिए 17 सितंबर का फैसला वैध नहीं है.
जस्टिस नरीमन ने क्या कहा था?
दरअसल, अप्रैल 2025 में टाटा ट्रस्ट्स एक ऐसा प्रोटोकॉल लाना चाहते थे, जिसमें उनके नॉमिनी डायरेक्टरों को पहले ट्रस्टी से सलाह लेनी होती है और फिर उसी के मुताबिक वोट देना या वोटिंग से दूर रहना होता है.
इतना ही नहीं, अगर कोई डायरेक्टर ट्रस्ट के निर्देश के हिसाब से काम नहीं करता है तो उसकी नामांकन वापस लेने पर भी विचार किया जा सकता था. इसी प्रस्ताव पर जस्टिस आर.एफ. नरीमन ने अपनी कानूनी राय दी थी.
जस्टिस नरीमन की क्या राय थी?
जस्टिस नरीमन ने कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 166 का हवाला देते हुए कहा था कि किसी भी कंपनी का डायरेक्टर ईमानदा
📡 स्रोत: ABP Live Vyapar