TMC के बागी सांसदों को BJP में जगह? समिक भट्टाचार्य बोले '...तो अंडे पड़ेंगे'
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →
NCPI में गए टीएमसी के बागी सांसदों की बीजेपी में एंट्री को लेकर जारी अटकलों और बयानबाजी के बीच बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने साफ कर दिया है कि इनको पार्टी में नहीं लिया जाएगा.
उन्होंने तंज कसते हुए यह भी कहा कि अगर टीएमसी के बागी सांसदों को बीजेपी में शामिल किया तो उनकी तरफ फेंके जाने वाले अंडे उनकी हमारी तरफ आएंगे.
भट्टाचार्य ने यह जवाब एनसीपीआई सांसद जगदीश बसुनिया के उस बयान के जवाब में दिया, जिसमें एनसीपीआई के 17 सांसद भाजपा में शामिल होने का दावा किया गया था.
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने कहा, 'वे कुछ भी कह सकते हैं, वह सांसद हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था में उन्हें बोलने का अधिकार है. भारतीय जनता पार्टी उन्हें शामिल करेगी या नहीं, इस पर कोई चर्चा नहीं हुई है.
उन्होंने आगे कहा कि अगर हम तृणमूल को इस तरह अपनाते हैं तो जो अंडे उनकी तरफ जा रहे थे वे हमारी तरफ आएंगे और हम अंडे खाने का जोखिम नहीं उठाना चाहते.'
TMC के बागी सांसद ने किया था बड़ा दावा
इससे पहले टीएमसी छोड़कर एनसीपीआई में शामिल होने वाले सांसद जगदीश चंद्र बसनिया ने दावा किया था कि दुर्गा पूजा से पहले तीन अल्पसंख्यक सांसदों को छोड़कर NCPI के 17 सांसद बीजेपी में शामिल हो जाएंगे.
एनसीपी सांसद ने दावा किया कि भाजपा ने हमें एनसीपी में शामिल होने के लिए मजबूर किया है, जबकि हम भाजपा में शामिल होना चाहते थे.
क्या बोले बसुनिया?
बसुनिया ने आगे कहा, 'अगर सब ठीक रहा तो दुर्गा पूजा से पहले हम 20 में से 17 सांसद भाजपा में शामिल हो सकते हैं.' उन्होंने यह भी दावा किया था कि सांसद अबू ताहेर और खलीलुर रहमान को विभिन्न विभागों का प्रभार दिया जाएगा और वे एनडीए का समर्थन भी करेंगे.
सांसद ने आगे कहा कि उनके निर्वाचन क्षेत्र अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र हैं, इसलिए वे सीधे भाजपा में नहीं जाएंगे.'
💡 पृष्ठभूमि (Background)
यह खबर बंगाल की राजनीति में एक विवादास्पद विषय पर प्रकाश डालती है: टीएमसी के बागी सांसदों को बीजेपी में शामिल करने की अटकलें और बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य का स्पष्ट विरोध। यह विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राजनीतिक गठबंधनों और पार्टी के भीतर के संघर्षों को दर्शाता है, जो चुनावी रणनीतियों और शक्ति संतुलन पर असर डाल सकता है। आम जनता पर इसका असर यह हो सकता है कि चुनावी दावों में बदलाव से मतदाता अपनी निष्ठा पर पुनर्विचार करें, और राजनीतिक स्थिरता तथा नीति निर्माण पर भी असर पड़ सकता