TMC के ऑडियो में क्या है? CEC ज्ञानेश कुमार पर करने वाली है खुलासा
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एसआईआर कवायद को लेकर जारी विवाद के बीच तृणमूल कांग्रेस का ममता बनर्जी गुट मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ हुई अपनी बैठकों की ऑडियो रिकॉर्डिंग जारी करने पर विचार कर रहा है.
इसका मकसद है कि उन्होंने बैठकों में राजनीतिक दलों से किस तरह की बातचीत की थी.
पीटीआई ने पार्टी सूत्रों के हवाले से मंगलवार को यह जानकारी दी.
उन्होंने कहा कि रिकॉर्डिंग अगले सप्ताह जारी किए जाने की उम्मीद है ताकि यह उजागर किया जा सके कि चुनाव आयोग के साथ बैठकों के दौरान राजनीतिक दलों से ज्ञानेश कुमार ने किस तरह बातचीत की, जिसमें चुनाव प्रक्रिया से संबंधित तकनीकी पहलुओं और प्रक्रियाओं पर चर्चाएं भी शामिल थीं.
TMC के पास तीन बैठकों की रिकॉर्डिंग
पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से बताया कि टीएमसी के ममता गुट के पास तीन बैठकों की रिकॉर्डिंग हैं और दावा किया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कार्यवाही के दौरान बहुत कम बात की.
उन्होंने कहा कि रिकॉर्डिंग में टीएमसी प्रतिनिधिमंडल की ओर से पूछे गए सवालों की प्रकृति और आयोग की ओर से दिए गए जवाब भी सामने आएंगे.
ममता गुट का क्या आरोप?
ममता के नेतृत्व वाला गुट ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस निर्वाचन आयोग पर पार्टी के संगठनात्मक कंट्रोल, नाम और चुनाव चिह्न को लेकर जारी उसकी सुनवाई में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगा रहा है.
विवाद आयोग के सामने तब आया जब ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले एक ग्रुप ने मौजूदा पार्टी संगठन के अधिकार को चुनौती दी और तृणमूल कांग्रेस पर नियंत्रण का दावा किया.
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले पक्ष ने इस दावे को खारिज कर दिया है.
सूत्रों ने कहा कि पार्टी ने पहले रिकॉर्डिंग जारी करने पर विचार किया था, लेकिन उस समय ऐसा नहीं करने का फैसला किया.
रिकॉर्डिंग जारी करने पर विचार करने का टीएमसी का कदम अप्रैल
📡 स्रोत: ABP Live
💡 पृष्ठभूमि (Background)
यह खबर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के ऑडियो रिकॉर्डिंग के बारे में है, जिसे वे मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ हुई बैठकों की ऑडियो जारी करने की योजना बना रहे हैं। यह विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चल सकता है कि TMC ने चुनावी प्रक्रियाओं और नियमों पर कैसे प्रभाव डालने की कोशिश की। यदि ऑडियो में अनैतिक या अवैध चर्चा पाई जाती है, तो यह चुनावी न्याय और पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर सकता है। आम जनता पर इसका असर यह हो सकता है कि वे चुनावी प्रक्रियाओं पर अधिक विश्वास या अविश्वास महसूस करें, और र