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ट्रांसजेंडर एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस:सर्जरी से महिला बने व्यक्ति को महिला अधिकार देने पर सवाल; केंद्र ने 7 साल पहले कानून बनाया था

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 29 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
ट्रांसजेंडर एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस:सर्जरी से महिला बने व्यक्ति को महिला अधिकार देने पर सवाल; केंद्र ने 7 साल पहले कानून बनाया था

क्या बायोलॉजिकल तौर पर पुरुष जन्मा व्यक्ति, सर्जरी करवाने के बाद महिला के लिए आरक्षित अधिकारों का दावा कर सकता है… इस सवाल को लेकर एक महिला संगठन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया ने बायोलॉजिक मेल को सर्जरी के बाद सरकारी दस्तावेजों में महिला दर्ज करने की व्यवस्था को चुनौती दी है।

याचिकाकर्ता संगठन 'विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया' ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 7और नियम 7 को चुनौती दी है। याचिका के मुताबिक, यह प्रावधान बायोलॉजिकल पुरुषों को सर्जरी के बाद सरकारी दस्तावेजों में खुद को 'महिला' के तौर पर दर्ज कराने की अनुमति देता है।

याचिका में 2014 के NALSA जजमेंट पर भी पुनर्विचार की मांग की गई है, जिसमें ट्रांसजेंडर लोगों को अपनी जेंडर पहचान की कानूनी मान्यता का अधिकार दिया गया था। 28 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान बेंच ने बताया - जन्म से पुरुष लेकिन महिला के रूप में पहचान रखने वाले ट्रांस व्यक्ति को बायोलॉजिकल महिला के समान दर्जा नहीं मिलना चाहिए।

याचिकाकर्ता बोले- सर्जरी से जैविक क्रोमोसोम-जेनेटिक्स नहीं बदलते याचिकाकर्ता संगठन के मुताबिक, जेंडर आइडेंटिटी के आधार पर जैविक महिलाओं के लिए बने संवैधानिक और कानूनी अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। मौजूदा व्यवस्था जेंडर आइडेंटिटी को जैविक सेक्स का आधार मानती है। इससे जन्म के समय पुरुष दर्ज व्यक्ति सरकारी दस्तावेजों में महिला पहचान हासिल कर सकते हैं।

याचिका में दावा है कि इससे जैविक महिलाओं के लिए बने संवैधानिक और कानूनी संरक्षण तथा लाभ प्रभावित होते हैं। याचिका में कहा गया, “कोई भी मेडिकल या सर्जिकल प्रक्रिया, चाहे वह कितनी भी व्यापक हो, व्यक्ति के जैविक सेक्स, क्रोमोसोम या जेनेटिक्स को नहीं बदलती।” सुनवाई में क्या हुआ याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अमित सिबल पेश हुए।

उन्होंने कहा कि यह याचिका खासतौर पर जैविक महिलाओं के अधिकारों की बात करती है। सिबल ने कहा कि ये लाभ बने रहने चाहिए और इनमें दखल नहीं होना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मुख्य याचिकाओं के समूह में जवाब तैयार किया जा रहा है। इस याचिका का जवाब भी उसी में शामिल किया जाएगा। इस स्थिति में उनका तर्क होगा कि मामला विधायिका पर छोड़ा जा सकता है।

जस्टिस बागची ने कहा, विधायिका ने

📡 स्रोत: Dainik Bhaskar

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