त्रिपुरारी हत्याकांड-एक जमीन, 40 साल की दुश्मनी और 2 हत्याएं:नवादा में 7 को उम्रकैद;अब परिवारों के सामने रोटी, पढ़ाई और बेटियों की शादी की चिंता
एक तरफ अदालत का फैसला है, जिसमें सात लोगों को हत्या के मामले में सश्रम आजीवन कारावास मिला है। दूसरी तरफ वो घर है, जहां इस फैसले के बाद बेटियों की शादी, बच्चों की पढ़ाई और दो वक्त की रोटी की चिंता खड़ी हो गई है।
नवादा के काशीचक प्रखंड के दौलाचक गांव में करीब चार दशक से चली आ रही जमीन की अदावत ने आखिरकार कई परिवारों को ऐसी जगह ला खड़ा किया है, जहां किसी के लिए न्याय की उम्मीद है तो किसी के लिए पूरी जिंदगी बिखर जाने का डर... 28 अप्रैल 2022 की शाम त्रिपुरारी सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
चार साल से ज्यादा समय तक चले मुकदमे के बाद अदालत ने इस हत्याकांड में एक ही परिवार के 7 सदस्यों को दोषी करार देते हुए सश्रम आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।
जिला और सत्र न्यायाधीश तृतीय उमेश कुमार की अदालत ने काशीचक थाना क्षेत्र के दौलाचक निवासी अवधेश सिंह, उमेश सिंह, अरुण कुमार, श्रवण कुमार, कुंदन कुमार, अजय सिंह और तुलन कुमार को सजा सुनाई। सभी पर हत्या की धारा में सश्रम आजीवन कारावास के साथ 10-10 हजार रुपए जुर्माना लगाया गया है।
आर्म्स एक्ट के तहत भी हर किसी को 3-3 साल की सजा और 5 हजार रुपए अर्थदंड दिया गया है। मामले में अभियोजन की ओर से अपर लोक अभियोजक अजीत कुमार ने पक्ष रखा है। शुरू से लेकर अंत तक पढ़िए भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट में पूरी कहानी... 10 कट्ठा जमीन...
और चार दशक से चली आ रही दुश्मनी नवादा के दौलाचक गांव में विवाद की जड़ करीब 10 कट्ठा जमीन बताई जाती है। परिवार के लोगों के अनुसार, रामपदारथ सिंह और उनके भाई भागीरथ सिंह के परिवार के बीच इस जमीन को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा था। यह विवाद सिर्फ कागजों और खेत की मेड़ तक नहीं रहा।
धीरे-धीरे रिश्तों में दरार बढ़ी और दोनों परिवार एक-दूसरे के आमने-सामने आ गए। परिवार की ओर से बताया गया कि साल 2004 में भागीरथ सिंह की हत्या हो गई थी। उस मामले में त्रिपुरारी सिंह और उनके पिता रामपदारथ सिंह को जेल जाना पड़ा था। परिवार का दावा है कि दोनों ने करीब सात साल जेल में बिताए।
यानी एक हत्या के बाद एक परिवार जेल पहुंचा, दूसरा परिवार अपने सदस्य को खो बैठा और जमीन का विवाद खत्म होने की जगह और गहरा होता गया। 2022 में खेत से भागे त्रिपुरारी, बगीचे तक पीछा कर मारी गोली 18 साल बाद इसी विवाद की कहानी फिर खून से लिखी गई। 28 अप्रैल 2022 की शाम त्रिपुरारी सिंह अपने गांव के आसपास थे।
पुराने रिकॉर्ड और उस समय की रिपोर्टों के अनुसार, उन पर हमला जमीन विवाद से जुड़ा बताया गया था। पुलिस के अनुसार, त्रिपुरारी हाल ही में जेल से बाहर आए थे। उनके परिवार का दूसरे पक्ष के साथ विवाद चल रहा था।
घटना को लेकर अभियोजन का मामला था कि त्रिपुरारी सिंह चिमनी भट्ठे के पास से गुजर रहे थे, तभी सात आरोपी वहां पहुंचे और उन पर गोलीबारी कर दी। गोली लगने से उनकी मौके पर ही मौत हो गई। वारदात के बाद आरोपी मोटरसाइकिल से फरार हो गए। मृतक की बहन रानी देवी ने काशीचक थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई।
मामला काशीचक थाना कांड संख्या 103/22 के रूप में दर्ज हुआ। अदालत में चश्मदीद गवाहों के बयान और पुलिस द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर सातों आरोपियों को दोषी माना गया। कोर्ट का फैसला: 7 दोषियों को सश्रम आजीवन कारावास अदालत के फैसले के बाद हत्या के इस मामले में कानूनी रूप से एक बड़ा पड़ाव आया है।
सातों दोषियों को हत्या की धारा में सश्रम आजीवन कारावास मिला है। इसके अलावा आर्म्स एक्ट में 3 साल की सजा सुनाई गई है। फैसले के बाद दोषी परिवारों में मायूसी और बेचैनी है। वहीं, त्रिपुरारी सिंह के परिवार ने अदालत के फैसले पर सार्वजनिक तौर पर विस्तृत टिप्पणी करने से इनकार किया है।
दैनिक भास्कर की टीम ने मृतक के परिवार से बात करने की कोशिश की। इस दौरान त्रिपुरारी सिंह के बेटे ने कहा, उन्होंने अदालत में अपनी गवाही दी है। कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है, उसी के आधार पर खबर प्रकाशित की जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि परिवार अब पत्रकारों के सामने कोई बयान नहीं देगा और उनका नाम छापा नहीं जाए।
परिवार ने यह भी कहा कि यदि दूसरे पक्ष की बात सामने रखी जाती है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। दूसरी तरफ के घरों में फैसला सुनकर उठे सवाल अदालत के फैसले के बाद दोषी ठहराए गए लोगों के परिवारों में अलग कहानी है। यहां महिलाएं अपने पति, बेटे और परिवार के भविष्य को लेकर परेशान हैं।
कुमकुम देवी ने कहा, उनके बेटे तुलन कुमार को हत्या के मामले में उम्रकैद हुई है। उनका आरोप है कि पूरे परिवार को साजिश के तहत फंसाया गया है। उन्होंने कोर्ट में हुई गवाही पर सवाल उठाते हुए कहा, मृतक के रिश्तेदार गुलशन कुमार ने खुद को घटना का चश्मदीद बताया।
कुमकुम देवी का सवाल है, अगर किसी व्यक्ति ने अपनी आंखों के सामने गोली चलने की घटना देखी थी तो वह हमलावर को रोकने या बचाने की कोशिश क्यों नहीं करता? उनका कहना है कि उनका परिवार खुद को निर्दोष मानता है और अब उन्हें न्याय की उम्मीद ऊपरी अदालत से है। ‘तीन बेटियां जवान हैं...
अब रिश्तेदारों से क्या कहेंगे?’ मुन्नी देवी के पति अजय सिंह भी सजा पाने वालों में शामिल हैं। उनके घर की चिंता सिर्फ पति के जेल जाने तक सीमित नहीं है। उनके सामने तीन बेटियों और एक बेटे की जिम्मेदारी है। मुन्नी देवी बताती हैं कि तीनों बेटियां जवान हो चुकी हैं। ऐसे में अब उनकी शादी की चिंता सबसे बड़ी है।
वह कहती हैं कि रिश्ता आएगा तो लोगों को क्या बताएंगे? परिवार की आर्थिक स्थिति पहले ही कमजोर है। पति के जेल जाने के बाद कमाई का सहारा खत्म हो गया है। शादी का खर्च उठाना तो दूर, रोजमर्रा के खर्च को लेकर भी चिंता है। उनके मुताबिक, पति के जेल जाने से बच्चों पर भी गहरा असर पड़ा है।
घर में पहले जिस व्यक्ति से परिवार को सहारा मिलता था, वह अब सलाखों के पीछे है। पति गुजरात में, बेटा जेल में... ‘अब सहारा कौन?’ मुन्नी देवी के मुताबिक, उनके पति लंबे समय से गुजरात में रहते हैं और डर के कारण गांव नहीं आते।
उन्हें आशंका रहती है कि गांव आने पर उनके साथ कोई अनहोनी हो सकती है या किसी अन्य मामले में फंसा दिया जाएगा। उनका इकलौता बेटा तुलन कुमार भी अब हत्या के मामले में सजा पा चुका है। मुन्नी देवी कहती हैं कि एक तरफ पति घर से दूर हैं और दूसरी तरफ बेटा जेल में है।
परिवार में ऐसा कोई पुरुष सहारा नहीं बचा, जो बच्चों और घर की जिम्मेदारी संभाल सके। गुड्डी देवी के घर में 3 बेटियां, 2 बेटे... आगे की जिंदगी का डर उमेश सिंह की पत्नी गुड्डी देवी भी इसी तरह की चिंता में हैं। उनके पति को भी आजीवन कारावास की सजा हुई है। गुड्डी देवी बताती हैं कि उनके तीन बेटियां और दो बेटे हैं।
बच्चों के भविष्य और शादी की चिंता लगातार बनी हुई है। उनका कहना है कि परिवार के पास आमदनी का कोई मजबूत साधन नहीं बचा है और रिश्तेदारों की मदद से किसी तरह घर चल रहा है। उनका दावा है कि इस मामले में शुरुआत में कुल 13 लोगों के नाम थे। बाद में तीन महिलाओं और दो अन्य रिश्तेदारों के नाम मामले से हटे।
आखिर में सात लोगों को सजा हुई। वह कहती हैं कि अब घर में परिवार की जिम्मेदारी संभालने वाला कोई पुरुष सदस्य नहीं है। ऐसे में बच्चों का भविष्य सबसे बड़ी चिंता बन गया है। जानकी देवी के सामने पूरा घर संभालने की चुनौती जानकी देवी के पति अवधेश सिंह और उनके दोनों बेटे अरुण कुमार और कुंदन कुमार भी सजा पाने वालों में शामिल हैं।
उनका कहना है कि कुंदन को एक बेटा और एक बेटी है। अरुण को भी एक बेटा और एक बेटी है। पति और दोनों बेटों के जेल जाने के बाद परिवार की जिम्मेदारी अब महिलाओं के कंधों पर आ गई है। जानकी देवी का आरोप है कि पुलिस की गलत रिपोर्ट के आधार पर उनके परिवार के सदस्यों को सजा हुई है।
उनका कहना है कि सालों से चला आ रहा जमीन विवाद आखिरकार उनके परिवार को बर्बादी की स्थिति में ले आया। हालांकि, अदालत ने अभियोजन के गवाहों और पुलिस द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर सातों को दोषी ठहराया है। परिवार अब इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देने की बात कर रहा है।
इस कहानी में एक तरफ अदालत का फैसला, दूसरी तरफ परिवारों की अपनी सच्चाई है। इस पूरे मामले को समझने के लिए दोनों पक्षों की तस्वीर देखना जरूरी है। एक तरफ त्रिपुरारी सिंह का परिवार है, जिसने 2022 में अपना सदस्य खोया। हत्या के बाद परिवार ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।
अदालत में गवाही हुई, पुलिस ने साक्ष्य पेश किए और अब सात लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। दूसरी तरफ दोषियों के परिवार हैं, जिनका कहना है कि उनके पति और बेटों को गलत तरीके से फंसाया गया। वे अदालत के फैसले को अंतिम न्याय नहीं मानते और ऊपरी अदालत में राहत की उम्मीद कर रहे हैं।
यही वजह है कि इस जमीन विवाद की कहानी सिर्फ हत्या और सजा तक सीमित नहीं है। इसके पीछे चार दशक का विवाद, दो परिवारों की दुश्मनी, जेल, आर्थिक नुकसान, बच्चों का भविष्य और लगातार बढ़ता अविश्वास छिपा है।
त्रिपुरारी पर भी दर्ज था हत्या का मुकदमा इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि 2022 की हत्या से पहले त्रिपुरारी सिंह खुद एक हत्या के मामले में आरोपी रह चुका था।
उपलब्ध पुरानी रिपोर्टों के अनुसार, वह अपने चाचा भागीरथ सिंह की हत्या के मामले में करीब सात साल जेल में रहा था और हत्या के मामले से बाहर आने के बाद ही 2022 में उसकी हत्या कर दी गई। उस समय पुलिस और स्थानीय लोगों ने भी जमीन विवाद को हत्या की वजह के तौर पर बताया था।
पुरानी रिपोर्टों में यह भी सामने आया था कि जेल से बाहर आने के बाद त्रिपुरारी का अपने चचेरे भाइयों से विवाद हुआ था और जमीन को लेकर तनाव बना हुआ था। हालांकि, किसी व्यक्ति का पूर्व आपराधिक मुकदमे में आरोपी होना और किसी अपराध में दोषी सिद्ध होना अलग-अलग कानूनी बातें हैं।
इसलिए इस मामले में भी पूर्व मुकदमे के तथ्यों को अदालत के अंतिम रिकॉर्ड के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। एक जमीन, दो हत्याएं और कई घरों का उजड़ना दौलाचक की इस कहानी में सबसे बड़ा सवाल शायद यही है कि आखिर वह जमीन कितनी बड़ी थी, जिसके लिए रिश्तों की कीमत खून से चुकानी पड़ी?
परिवार के लोगों के अनुसार, करीब 10 कट्ठा जमीन को लेकर चार दशक से विवाद था। एक पीढ़ी में चाचा की हत्या हुई, दूसरी में भतीजे की। एक परिवार ने जेल और मुकदमा देखा, दूसरे ने अपना सदस्य खोया। अब तीसरी पीढ़ी के बच्चे उस विवाद का असर झेल रहे हैं।
महिलाओं के कंधे पर परिवार, बच्चों के सामने अनिश्चित भविष्य फैसले के बाद सबसे ज्यादा असर उन महिलाओं पर पड़ा है, जिनके पति या बेटे जेल चले गए हैं। किसी के सामने तीन बेटियों की शादी की चिंता है, किसी के सामने पांच बच्चों के पालन-पोषण का सवाल।
किसी परिवार का कमाने वाला जेल में है तो किसी के घर में पति पहले से बाहर रहने को मजबूर है। इन महिलाओं के बयानों में एक बात समान है- उन्हें आने वाला समय दिखाई नहीं दे रहा। हालांकि, अदालत के फैसले के खिलाफ कानूनी रास्ता खुला है। दोषी पक्ष ऊपरी अदालत में अपील कर सकता है।
ऐसे में अंतिम न्यायिक स्थिति आगे की कानूनी प्रक्रिया से तय होगी।
📡 स्रोत: NewsData.io