'UPA में खराब हुई IDBI की हालत', सीतारमण का पलटवार, कांग्रेस के 5 कामों पर सवाल
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कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आईडीबीआई बैंक के बेचने को लेकर पीएम मोदी पर निशाना साधा था. उन्होंने IDBI बैंक के कर्मचारियों को एक लेटर लिखा था.
राहुल गांधी के सवालों पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पलटवार किया है.
उन्होंने कांग्रेस पर बैंकों का निजी इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए पांच उदाहरण गिनवाए हैं.
राहुल गांधी ने लेटर में लिखा कि कांग्रेस के समय में आईडीबीआई बैंक बना और इसने देश का उद्योग खड़ा करने में मदद की. कांग्रेस के समय में बैंक बनते थे और मोदी के समय में बिकते हैं.
मैं बैंक के कर्मचारियों के साथ खड़ा हूं.
निर्मला सीतारमण ने किया पलटवार
निर्मला सीतारमण ने सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर किया है.
उन्होंने लिखा, हम सभी जानते हैं कि कांग्रेस ने किस तरह बैंकों और वित्तीय संस्थानों का इस्तेमाल अपनी निजी संपत्ति की तरह किया है.
उन्होंने बैंक कर्मचारियों पर दबाव डालकर, नियमों को ताक पर रखते हुए, अपनी मर्जी से लोन बांटे हैं. आइए, कुछ उदाहरण देखते हैं.
We all know how @INCIndia has used Banks and financial institutions as personal entities and pressured bank employees to extend loans at their whim, bypassing prudent lending norms.
Let me list a few instances. - In 1957, Haridas Mundra got money from LIC due to influence by the Congress leaders. - In 1976, Indira Gandhi's government removed SBI Chairman R.K.
Talwar after he refused political pressure to relax lending conditions for a company linked to Sanjay Gandhi's circle. - Sanjay Gandhi pressured the Central Bank of India over loans to Maruti. - B.
Janardhana Poojary, MoS Finance under Indira Gandhi and Rajiv Gandhi pressured bank employees to issue loans in the 1980s. - Pawan Kumar Bansal, as a minister in the UPA, pressured Canara Bank to give loans to his family-linked businesses.
The IDBI Bank was handed over to us in poor shape, as IDBI itself was forced to lend to large business groups with close connections to @INCIn
📡 स्रोत: ABP Live
💡 पृष्ठभूमि (Background)
यह खबर भारत के प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस और सरकार के बीच बैंकिंग क्षेत्र पर विवाद को उजागर करती है। राहुल गांधी ने IDBI बैंक के निजीकरण पर सवाल उठाया, जबकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उनके आरोपों का खंडन कर पाँच उदाहरणों से जवाब दिया। यह विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बैंकिंग नीति और सरकारी निर्णयों पर जनता की राय को प्रभावित कर सकता है। आम जनता पर इसका असर यह हो सकता है कि बैंकिंग सेवाओं की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर विश्वास प्रभावित हो, और निवेशकों तथा ग्राहकों को निर्णय लेने में सतर्क