UPI MDR पर फिनटेक कंपनियों की सरकार से बड़ी मांग- 'कानूनन तय हो हमारा हिस्सा'

पेमेंट एग्रीगेटर (PA) यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ट्रांजैक्शन पर लगने वाले मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) में से एक फिक्स्ड हिस्सा अपने लिए चाहते हैं ताकि उन्हें इसके लिए पार्टनर बैंकों पर निर्भर नहीं रहना कि वे फीस का कुछ हिस्सा उन्हें दे.
यानी कि अब कंपनियां रेवेन्यू शेयरिंग के लिए पूरी तरह बैंकों की मर्जी पर निर्भर नहीं रहना चाहते हैं. फिनटेक कंपनियों की क्या है मांग? मौजूदा व्यवस्था के तहत जब भी कोई डिजिटल ट्रांजैक्शन चार्ज वसूला जाता है, तो उसका सबसे बड़ा हिस्सा 'इश्यूइंग बैंक' (ग्राहक के बैंक) के पास जाता है.
मर्चेंट की तरफ से पेमेंट प्रोसेस करने वाले एग्रीगेटर्स (जैसे Razorpay, Cashfree, Paytm) को बैंक अपनी मर्जी से हिस्सा ट्रांसफर करते हैं. इस तरीके से समझ सकते हैं कि जब भी कोई बड़ा मर्चेंट किसी डिजिटल ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या प्रोसेसिंग फीस चुकाता है, तो वह पैसा सीधे पेमेंट कंपनियों को नहीं मिलता.
पैसा पहले इश्यूइंग बैंक- यानी उस बैंक के पास जाता है जिसका डेबिट/क्रेडिट कार्ड या खाता ग्राहक इस्तेमाल कर रहा है. फिर बैंक तय करता है वह उस फीस में से कितना छोटा हिस्सा पेमेंट एग्रीगेटर को देगा.
ऐसे में अब पेमेंट कंपनियां चाहती हैं कि सरकार पहले से ही नियम बनाकर यह तय कर दे कि उन्हें अपनी हिस्सेदारी के लिए बैंकों के आगे हाथ न फैलाना पड़े. कोई फिक्स्ड नियम नहीं
बैंकों और इन पेमेंट कंपनियों के बीच हिस्से का बंटवारा किस हिसाब से होगा, इसे लेकर कोई फिक्स्ड नियम नहीं है. यह पूरी तरह कमर्शियल नेगोशिएशन (आपसी मोलभाव) पर चलता है. बड़े बैंक अक्सर पेमेंट कंपनियों को बहुत कम हिस्सा देते हैं. फिनटेक कंपनियों का तर्क है कि प्लेटफॉर्म हमारा है, लेकिन मर्जी बैंक की चलती है.
मर्चेंट को अपने प्लेटफॉर्म पर जोड़ना, उनकी सुरक्षा की जांच करना (KYC) और बिना फेल हुए पेमेंट गेटवे का सर्वर चलाना- यह सारा तकनीकी और कानूनी खर्च पेमेंट कंपनियां उठाती हैं.
इतनी मेहनत और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च के बावजूद उन्हें अपनी कमाई के लिए बैंकों के रहमों-करम पर निर्भर रहना पड़ता है. इसे लेकर ही अब सरकार पर नियम बनाने का दबाव डाला जा रहा है. <iframe title="Europe और UK Investors के लिए India का Green Ch
📡 स्रोत: ABP Live Vyapar