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उत्तराखंड: बदरीनाथ धाम में घृत कंबल की परंपरा का निर्वहन

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 23 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
उत्तराखंड: बदरीनाथ धाम में घृत कंबल की परंपरा का निर्वहन

उत्तराखंड के चमोली जिले के विश्व प्रसिद्ध बदरीनाथ धाम में भगवान बदरी विशाल की शीतकालीन पूजा परंपराओं से जुड़ी सदियों पुरानी घृत कंबल की परंपरा का निर्वहन किया गया। एकादशी के शुभ अवसर पर सीमांत गांव माणा के मोल्फा परिवार ने भगवान बदरी विशाल को ऊनी लबादा यानी पवित्र घृत कंबल और पहाड़ी गाय का शुद्ध देसी घी भेंट किया।

इस धार्मिक परंपरा का विशेष महत्व है और यह उत्तराखंड की समृद्ध लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है। बदरीनाथ धाम में भगवान बदरी विशाल को शीतकाल के दौरान ठंड से सुरक्षित रखने के लिए घृत कंबल ओढ़ाने की प्राचीन परंपरा निभाई जाती है। इस परंपरा के तहत माणा गांव की सुहागिन महिलाएं और कन्याएं उपवास रखकर एक ही दिन में ऊन का विशेष लबादा तैयार करती हैं।

इसके बाद इसे शुद्ध देसी घी के साथ भगवान बदरी विशाल को समर्पित किया जाता है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बदरीनाथ धाम के कपाट बंद होने के समय मंदिर के मुख्य पुजारी यानी रावल भगवान के विग्रह पर घी और केसर का लेप लगाकर घृत कंबल ओढ़ाते हैं। इसके बाद शीतकाल के अगले छह महीनों तक भगवान इसी अवस्था में विराजमान रहते हैं।

बदरीनाथ धाम के कपाट जब गर्मियों में दोबारा खुलते हैं, तो घृत कंबल पर लगे घी की स्थिति को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष आस्था रहती है। मान्यता है कि कंबल पर घी का ताजा बने रहना देश में सुख-समृद्धि का शुभ संकेत होता है। इसके बाद घृत कंबल के टुकड़ों को श्रद्धालुओं में महाप्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

भगवान बदरी विशाल से जुड़ी घृत कंबल की यह अनूठी परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ माणा गांव की सांस्कृतिक पहचान को भी जीवंत रखती है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा उत्तराखंड की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत और स्थानीय लोगों की भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा का प्रतीक है।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।