उत्तराखंड: बागेश्वर के कौसानी से जुड़ी हैं, महात्मा गांधी की यादें
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उत्तराखंड के बागेश्वर जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर बसा कौसानी आज हिमालय की अनुपम सुंदरता, शांत वातावरण और चाय बागानों के लिए देश-दुनिया के पर्यटकों को आकर्षित करता है। लेकिन कौसानी की पहचान केवल इसकी प्राकृतिक सुंदरता तक सीमित नहीं है। इस शांत पहाड़ी स्थल का महात्मा गांधी से जुड़ा इतिहास इसे विशेष बनाता है।
वर्ष 1929 में कुमाऊं यात्रा के दौरान महात्मा गांधी बागेश्वर के कौसानी पहुंचे थे। हालांकि उनकी मूल योजना यहां सिर्फ दो दिन रुकने की थी, लेकिन कौसानी की शांति और हिमालयी सौंदर्य से प्रभावित होकर बापू करीब 14 दिन यहां रुके। कौसानी प्रवास के दौरान गांधीजी जिस डाक बंगले में ठहरे थे, आज वही अनासक्ति आश्रम के नाम से जाना जाता है।
यहां आज भी गांधीजी से जुड़ी स्मृतियां, तस्वीरें, पुस्तकें और अन्य सामग्री संरक्षित हैं। परिसर में प्रार्थना स्थल भी है, जहां गांधी दर्शन के अनुरूप प्रार्थना सभाएं आयोजित की जाती हैं। परिसर में गांधीजी के प्रसिद्ध तीन बंदरों की प्रतिमाएं भी लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं। आश्रम का शांत वातावरण आगंतुकों को इतिहास के उस दौर से जोड़ता है, जब गांधीजी ने यहां रहकर गीता के अपने चिंतन को शब्द देने का काम किया था।
उनकी इस कृति का नाम अनासक्ति योग रखा गया। कौसानी की प्राकृतिक सुंदरता से प्रभावित होकर गांधीजी ने इसे भारत का स्विट्जरलैंड भी कहा था। आजादी के बाद वर्ष 1966 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी ने इस डाक बंगले को उत्तर प्रदेश महात्मा गांधी स्मारक निधि को सौंपा। बाद में गांधीजी की पुस्तक अनासक्ति योग के नाम पर इसे अनासक्ति आश्रम के रूप में विकसित किया गया।
व्यापार मंडल जिलाध्यक्ष बबलू नेगी कहते हैं कि कौसानी हिमालय और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण पर्यटकों को आकर्षित करता है, वहीं दूसरी ओर महात्मा गांधी से जुड़ी स्मृतियां इसे ऐतिहासिक महत्व देती हैं। अनासक्ति आश्रम के व्यवस्थापक किशन बिष्ट के अनुसार, आश्रम में आने वाले पर्यटक गांधीजी के जीवन, विचार और कौसानी प्रवास से जुड़ी स्मृतियों को करीब से जानने में रुचि लेते हैं।
उनके मुताबिक, यहां का वातावरण आज भी काफी शांत है और गांधीजी की स्मृतियों को महसूस करने के लिए लोग कुछ समय आश्रम परिसर में बिताते हैं। स्थानीय निवासी मानते हैं कि अनासक्ति आश्रम को लेकर और अधिक प्रचार-प्रसार करने की आवश्यकता है। उनका मानना है कि नई पीढ़ी को कौसानी के इस ऐतिहासिक पक्ष से जोड़ने के लिए स्कूल-कॉलेज स्तर पर भी जानकारी दी जानी चाहिए।
पर्यटकों को भी कौसानी आकर काफी अच्छा लगता है। उनका कहना है कि यहां की शांति उन्हें काफी सुकून देती है। गांधी जी ने जैसा यहां के विषय में कहा था, वो उसे अनुभव करते हैं। कौसानी आज भी प्रकृति और इतिहास का ऐसा संगम है, जहां हिमालय की खूबसूरती के साथ बापू की स्मृतियां कदम-कदम पर दिखाई देती हैं।
यही वजह है कि यहां पहुंचने वाला पर्यटक केवल पहाड़ों का सौंदर्य देखकर वापस नहीं लौटता, बल्कि गांधीजी के कौसानी प्रवास की कहानी भी अपने साथ लेकर जाता है।
बाइट 1- बबलू नेगी, व्यापार मंडल जिलाध्यक्ष, बागेश्वर
बाइट 2- किशन सिंह बिष्ट, व्यवस्थापक अनासक्ति आश्रम
बाइट 3- जेसी आर्य, स्थानीय नागरिक
बाइट 4- सिमी, पर्यटक
💡 पृष्ठभूमि (Background)
कौसानी, उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में स्थित एक पहाड़ी गाँव, 1929 में महात्मा गांधी के कुमाऊँ यात्रा के दौरान उनके द्वारा देखी गई जगह है। यह स्थल अपनी हिमालयी सुंदरता, शांत वातावरण और चाय बागानों के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन गांधीजी के यहाँ आने का इतिहास इसे और भी खास बनाता है। इस खबर का महत्व है क्योंकि यह गांधीजी के ग्रामीण भारत में यात्राओं और उनके विचारों के प्रसार को उजागर करती है। जनता के लिए यह प्रेरणादायक है, जिससे स्थानीय पर्यटन में वृद्धि और सांस्कृतिक पहचान की पुनः पुष्टि की उम्मीद है।