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उत्तराखंड: ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से बढ़ा ग्लेशियर झीलों का खतरा, वाडिया संस्थान कर रहा निगरानी

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 26 सितंबर 2026
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
उत्तराखंड: ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से बढ़ा ग्लेशियर झीलों का खतरा, वाडिया संस्थान कर रहा निगरानी

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Category- Science & Technology, Environment, Disaster Management, Dehradun

उत्तराखंड: ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से बढ़ा ग्लेशियर झीलों का खतरा, वाडिया संस्थान कर रहा निगरानी

एंकर- उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक डॉ. पंकज चौहान ने उत्तराखंड में तेजी से पिघलते ग्लेशियरों और उनसे बढ़ते खतरे को लेकर जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि वाडिया संस्थान गढ़वाल, कुमाऊं और लद्दाख क्षेत्र के ग्लेशियरों का लगातार अध्ययन कर रहा है।

वैज्ञानिकों के पिछले 15 से 20 वर्षों के अध्ययन में सामने आया है कि उत्तराखंड के कई ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं। इसके चलते ग्लेशियर झीलों का आकार भी बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक भविष्य में इन झीलों के फटने की स्थिति में निचले क्षेत्रों में नदियों के प्रवाह पर असर पड़ सकता है।

आंकलन के अनुसार उत्तराखंड में 13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई है, जिनमें 5 को अत्यधिक खतरनाक श्रेणी में रखा गया है। इन झीलों की स्थिति पर नजर रखने और समय रहते चेतावनी जारी करने के लिए वाडिया संस्थान ने अर्ली वॉर्निंग सिस्टम के जरिए निगरानी शुरू की है।

बाइट- डॉ. पंकज चौहान, वैज्ञानिक, वाडिया इंस्टीट्यूट, देहरादून

वीडियो कैप्शन_ उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों के खतरे पर वाडिया संस्थान की निगरानी

💡 पृष्ठभूमि (Background)

ग्लेशियर झीलों के खतरे पर यह खबर उत्तराखंड के बढ़ते जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को दर्शाती है। जब ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं, तो उनके नीचे जमा पानी अचानक निकल कर बड़े पैमाने पर बाढ़ और भूस्खलन का कारण बन सकता है। यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी और स्थानीय समुदायों के लिए जोखिम को उजागर करता है। आम जनता पर इसका असर गहरा है: गाँवों में बाढ़ की संभावना बढ़ती है, कृषि भूमि नष्ट हो सकती है, और पर्यटन पर भी असर पड़ सकता है। वाडिया संस्थान की निगरानी से समय रहते चेताव

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।