उत्तराखंड: रुद्रप्रयाग में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत संवेदीकरण कार्यक्रम आयोजित
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किसी समाज की पहचान उसकी भाषा, लोकगीतों, पारंपरिक वेशभूषा और खानपान में बसती है। पहाड़ की संस्कृति भी यहां के लोकगीतों में गूंजती है, पारंपरिक परिधानों में झलकती है और स्थानीय व्यंजनों के स्वाद में रची-बसी है। इसी सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से रुद्रप्रयाग में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत संवेदीकरण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
इस कार्यक्रम में 12 विद्यालयों की छात्राओं ने प्रतिभाग किया। इस दौरान छात्राओं ने लोकगीतों, पारंपरिक परिधानों और पहाड़ी व्यंजनों के जरिए उत्तराखंड की समृद्ध विरासत को जीवंत किया। इस अवसर पर केदारनाथ विधायक आशा नौटियाल ने लोक संस्कृति और पारंपरिक उत्पादों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम में प्रतिभाग करने वाली छात्राओं ने पहाड़ी उत्पादों से तैयार पारंपरिक व्यंजनों का प्रदर्शन किया। स्थानीय अनाज और पहाड़ के उत्पादों से बने व्यंजनों के जरिए उन्होंने उत्तराखंड की खानपान परंपरा को प्रदर्शित किया। उन्होंने कहा कि आधुनिकता के इस दौर में पारंपरिक पहनावे और लोक कलाओं को जीवंत बनाए रखने के लिए ऐसे आयोजन जरूरी हैं।
बाइट 1- आशा नौटियाल, विधायक, केदारनाथ
बाइट 2- भुवनेश्वरी चंदानी, कार्यक्रम समन्वयक
बाइट 3- प्राची, छात्रा
बाइट 4- वंदना, छात्रा
💡 पृष्ठभूमि (Background)
रुद्रप्रयाग में राष्ट्रीय शिक्षा नीति‑2020 के तहत सांस्कृतिक संवेदीकरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिससे स्थानीय भाषा, लोकगीत, परिधान और खानपान की परंपराएँ नई पीढ़ी तक पहुँचें। यह पहल शिक्षा नीति के मूलभूत उद्देश्य, अर्थात् सांस्कृतिक जागरूकता और पहचान को सुदृढ़ करने, को प्रत्यक्ष रूप से लागू करती है। कार्यक्रम का महत्व इसलिए है क्योंकि यह ग्रामीण विद्यालयों में सांस्कृतिक शिक्षा को प्रोत्साहित करता है, जिससे विद्यार्थियों में गर्व और आत्मसम्मान की भावना विकसित होती है। यदि यह कार्यक्रम सफल रहा