वैशाली नाव हादसा:13 बच्चों को क्यों दी गई जल समाधि:शवों को नदी में विसर्जित करने के पीछे क्या है कारण, अनोखी परंपरा के बारे में जानिए
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →वैशाली के राघोपुर में गंगा नदी में नाव डूबने से 13 बच्चों की मौत ने कई परिवारों को उजाड़ दिया। एक ही हादसे में इतने बच्चों की मौत के बीच उनके अंतिम संस्कार का तरीका भी चर्चा में आ गया। बच्चों के शवों को अग्नि के हवाले करने के जगह गंगा में विसर्जित किया गया। वजह कोई नई मान्यता या हादसे से जुड़ा फैसला नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक परंपरा है। भगतान टोला के कुछ परिवारों का कहना है कि उनके वंश में आज तक किसी का दाह संस्कार नहीं हुआ। पूर्वजों के समय से ही मृतकों के शव नदी में विसर्जित किए जाते रहे हैं। आखिर इस परंपरा की शुरुआत कब और कैसे हुई?
क्या इसका संबंध कबीर पंथ से है? जल समाधि और शव विसर्जन में क्या अंतर है?
मृत्यु के बाद भी शरीर को दूसरे जीवों के काम आने देने की मान्यता के पीछे क्या सोच है?
इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए दैनिक भास्कर ने इस परंपरा की पड़ताल की। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… घटना से जुड़ी तस्वीरें देखिए… ‘हमारे वंश में कभी दाह संस्कार नहीं हुआ’ राघोपुर के भगतान टोला में रहने वाले चंदन कुमार बताते हैं, हमारे परिवार में किसी की मृत्यु होने पर दाह संस्कार नहीं किया जाता है।
मृतक के शरीर को नदी में विसर्जित करने की परंपरा है। यह रिवाज हमारे पूर्वजों के समय से चला आ रहा है। परिवार की पीढ़ियां इसका पालन करती रही हैं। चंदन कुमार के अनुसार, हमारे वंश में अब तक किसी का अंतिम संस्कार जलाकर नहीं किया गया। परिवार के लोग अपने पूर्वजों के बताए तरीके को ही अपनाते आए हैं।
इसी वजह से हादसे में जान गंवाने वाले बच्चों के मामले में भी उन्होंने इसी परंपरा का पालन किया। वे इस बात पर जोर देते हैं कि बच्चों की मौत नदी में डूबने के कारण हुई, इसलिए उनके शवों को नदी में विसर्जित नहीं किया गया। उनके परिवार में यह रीति पहले से प्रचलित है और सामान्य परिस्थितियों में भी मृतकों के लिए इसी का पालन किया जाता है।
इस बयान से परिवार की मान्यता स्पष्ट होती है। क्या है कबीर पंथ?
कबीर पंथ संत कबीर की वाणी और शिक्षाओं पर आधारित धार्मिक परंपरा है। संत कबीर 15वीं सदी के प्रमुख संत-कवि और भक्ति आंदोलन की महत्वपूर्ण शख्सियतों में शामिल थे। उनकी शिक्षाओं में ईश्वर की भक्ति, मनुष्य की समानता, जातिगत भेदभाव का विरोध और धार्मिक आडंबरों पर सवाल उठाने की भावना प्रमुख थी।
कबीर ने अपनी वाणी में बाहरी दिखावे की जगह मनुष्य के आचरण और सच्ची भक्ति को महत्व दिया। उनके दोहे और पद आम बोलचाल की भाषा में थे। इसी वजह से उनकी शिक्षाएं समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचीं। उनकी रचनाओं में जाति, धर्म और सामाजिक भेदभाव से जुड़े सवाल भी मिलते हैं। कबीर के निधन के बाद उनके फॉलोअर्स ने उनकी शिक्षाओं को आगे बढ़ाया।
समय के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में कबीर पंथ की शाखाएं, मठ और आश्रम विकसित हुए। वाराणसी का कबीर चौरा और छत्तीसगढ़ में कबीर पंथ की धर्मदास परंपरा से जुड़े धार्मिक केंद्र इसकी महत्वपूर्ण कड़ियों में गिने जाते हैं। जल समाधि क्या होती है?
जल समाधि शब्द का इस्तेमाल कई बार मृत शरीर को नदी में प्रवाहित करने के अर्थ में किया जाता है, लेकिन धार्मिक और सामाजिक संदर्भ में दोनों को हमेशा एक ही प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। भारतीय परंपराओं में समाधि का संबंध आध्यात्मिक साधना से भी है। कुछ संप्रदायों में सिद्ध संतों या संन्यासियों के निधन के बाद उनके शरीर को भूमि में समाधि देकर उस स्थान को स्मृति या श्रद्धा के केंद्र के रूप में विकसित किया जाता है।
वहीं, कुछ धार्मिक परंपराओं में मृत शरीर को जल में प्रवाहित करने की प्रथा भी बताई जाती है। सामान्य हिंदू अंतिम संस्कार में पार्थिव शरीर का दाह संस्कार किया जाता है। इसके बाद अस्थियों को पवित्र नदी में विसर्जित करने की परंपरा भी प्रचलित है, लेकिन अस्थि विसर्जन और पूरे शव को नदी में प्रवाहित करना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
राघोपुर के भगतान टोला में परिवार जिस रीति का उल्लेख कर रहा है, उसे समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि वे खुद इसे किस नाम से पुकारते हैं, उनकी धार्मिक मान्यता क्या है और उनके यहां अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया कैसे निभाई जाती है। शरीर प्रकृति के काम आए, इसलिए जल में विसर्जन की मान्यता कबीर पंथ से जुड़ी कुछ धार्मिक व्याख्याओं में परमार्थ और जीवों के प्रति करुणा को महत्व दिया जाता है।
इस विचार के अनुसार, मनुष्य को अपने जीवन में दूसरों की सेवा करनी चाहिए। कुछ फॉलोअर्स इसी भावना को मृत्यु के बाद भी शरीर से जोड़कर देखते हैं। इस मान्यता की एक व्याख्या यह है कि मनुष्य का शरीर प्रकृति से बना है और मृत्यु के बाद उसे फिर प्रकृति में मिल जाना है। शरीर के प्राकृतिक तत्व दूसरे जीवों और पर्यावरणीय चक्र का हिस्सा बनते हैं।
कुछ लोग इसे इस रूप में देखते हैं कि मृत्यु के बाद भी शरीर किसी न किसी रूप में दूसरे जीवों के काम आ सकता है। क्या कबीर पंथ की शुरुआत के साथ ही शुरू हुई थी यह परंपरा?
संत कबीर की शिक्षाओं से प्रेरित कबीर पंथ का विकास उनके जीवनकाल और निधन के बाद अलग-अलग चरणों में हुआ। उनके फॉलोअर्स ने समय के साथ धार्मिक केंद्र स्थापित किए और अपनी शाखाओं के मुताबिक परंपराएं विकसित कीं। भगतान टोला में मृतकों को नदी में विसर्जित करने की परंपरा के बारे में परिवार इसे पूर्वजों से मिला रिवाज बताता है वैशाली में कबीर पंथ से जुड़े धार्मिक केंद्र का भी मिलता है उल्लेख वैशाली जिले में कबीर पंथ से जुड़े धार्मिक केंद्र की मौजूदगी का उल्लेख सरकारी रिकॉर्ड में मिलता है।
बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद से संबंधित साल 2019 की अधिसूचना में महुआ क्षेत्र के मुहम्मदपुर बेरई उर्फ शंकरपुर स्थित कबीर पंथी आश्रम का उल्लेख किया गया था। यह जानकारी जिले में कबीर पंथ से जुड़ी धार्मिक गतिविधियों और संस्थागत उपस्थिति के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। राघोपुर के नाव हादसे में बच्चों की मौत ने कई परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया।
ऐसे समय में परिवारों ने अपने यहां प्रचलित अंतिम संस्कार की रीति का पालन किया। भगतान टोला के परिवार का कहना है कि नदी में विसर्जन का फैसला हादसे के कारण नहीं लिया गया था। यह उनकी पुरानी परंपरा है।
📡 स्रोत: NewsData.io