वसुंधरा ताल में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम, मुख्य सचिव ने वैज्ञानिक दल को हरी झंडी दिखाकर किया रवाना
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29 सितम्बर 2026, देहरादून: उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों की निगरानी एवं पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई है। चमोली जिले में स्थित वसुंधरा ताल में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने के लिए मुख्य सचिव आनंद बर्धन ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया है।
मुख्य सचिव ने कहा कि अत्याधुनिक सेंसर, उपग्रह संचार और वास्तविक समय में आंकड़ों की निगरानी से ग्लेशियल झीलों में होने वाले परिवर्तनों को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलेगी।
यह पहला वैज्ञानिक दल है, जो उत्तराखण्ड की ग्लेशियल झील में निगरानी एवं पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए उच्च हिमालयी क्षेत्र में जा रहा है। उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबस्र्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत यह अभियान संचालित किया जा रहा है।
अभियान दल में केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिक एवं तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं। फील्ड सहयोग के लिए राज्य आपदा प्रतिवादन बल, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल तथा भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के जवान भी दल के साथ रहेंगे। यूएसडीएमए ने अभियान के लिए आवश्यक समन्वय एवं लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराई है।
टीम को सेटेलाइट फोन व लो अर्थ आर्बिट डिवाइस उपलब्ध कराई गई है, ताकि टीम का संचार व समन्वय यूएसडीएमए के साथ बना रहे।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अभियान दल को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि उत्तराखण्ड उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित होने के कारण ग्लेशियल झीलों की निगरानी और उनसे जुड़े संभावित जोखिमों के प्रति सतर्कता हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वसुंधरा ताल में अर्ली वार्निंग सिस्टम की स्थापना से आपदा तैयारियों को तकनीक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से और अधिक मजबूती मिलेगी।
इन उपकरणों से होगी वसुंधरा ताल की निगरानी
जलस्तर सेंसर-झील के जलस्तर में उतार-चढ़ाव एवं असामान्य परिवर्तनों की निगरानी
स्वचालित मौसम केंद्र-तापमान, आर्द्रता, वर्षा, हवा की गति एवं दिशा, वायुदाब तथा प्रकाश की तीव्रता का मापन
स्नो डेप्थ सेंसर-झील के आसपास बर्फ की गहराई में होने वाले बदलावों की निगरानी
स्नो सब सरफेस टेंपरेचर सेंसर-बर्फ की विभिन्न गहराइयों पर तापमान में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए आठ सेंसर
टिल्ट एवं एक्सेलेरोमीटर सेंसर-चयनित स्थानों पर झुकाव, कंपन एवं हलचल की निगरानी
जल प्रवाह सेंसर-जल प्रवाह में होने वाले परिवर्तनों की निगरानी
सौर ऊर्जा प्रणाली-दुर्गम उच्च हिमालयी क्षेत्र में उपकरणों को विद्युत आपूर्ति
उपग्रह संचार प्रणाली-मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में आंकड़ों को बेस स्टेशन तक भेजने की व्यवस्था
डेटा लॉगर एवं मॉनिटरिंग डैशबोर्ड-प्राप्त आंकड़ों का रिकॉर्ड, ऑनलाइन प्रदर्शन तथा निर्धारित थ्रेशोल्ड के आधार पर अलर्ट जनरेशन
तकनीकी आंकड़ों के आधार पर होगा जोखिम का आकलन
वसुंधरा ताल एवं उसके आसपास के पर्यावरणीय और जलवैज्ञानिक परिवर्तनों की लगातार निगरानी की जा सकेगी। सेंसरों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर संभावित असामान्य परिवर्तनों की पहचान करने और समय रहते संबंधित तंत्र को अलर्ट उपलब्ध कराने में सहायता मिलेगी।
संलग्न- फोटो
🎙️ वॉयस ऑफ क्रांति का मत
वसुंधरा ताल में स्थापित अर्ली वार्निंग सिस्टम हमें याद दिलाता है कि प्रकृति की चेतावनियों को अनदेखा करना मानवता के लिए जोखिम भरा है। वैज्ञानिकों की यह पहल हमें सिखाती है कि समय पर तैयारी और सहयोग से आपदाओं को रोका जा सकता है। हमें भी अपने समाज में सहमति, संवाद और जिम्मेदारी को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि हम प्राकृतिक आपदाओं के सामने एकजुट होकर सुरक्षित भविष्य बना सकें।