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विपक्ष का सुप्रीम कोर्ट मार्च- राहुल-प्रियंका खुली गाड़ी में सवार: तेजस्वी-अखिलेश साथ; लीगल टीम ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका दायर करने पहुंची

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 12 अक्टूबर 2026 👁️ 4 बार पढ़ा गया
प्रकाशक: वॉयस ऑफ क्रांति
विपक्ष का सुप्रीम कोर्ट मार्च- राहुल-प्रियंका खुली गाड़ी में सवार:  तेजस्वी-अखिलेश साथ; लीगल टीम ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका दायर करने पहुंची

रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी और उनके सहयोगी कई विपक्षी दलों के साथ एक बड़े मार्च को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचने की तैयारी कर रहे हैं। यह मार्च मुख्य रूप से चुनाव आयोग (CEC) के चेयरमैन ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध और उनके इस्तीफे की मांग पर केंद्रित है, जिसमें कई सांसद, पार्टी नेता और वकील भी शामिल हैं।

मार्च की तैयारी के दौरान, 12 अक्टूबर 2026 को राहुल गांधी ने लगभग 40 मिनट का प्रेस कॉन्फ्रेंस दिया, जिसमें उन्होंने इस विरोध को "शिवजी की बारात" के समान बताया और कहा कि इसमें कोई भी नागरिक या राजनेता शामिल हो सकता है। इस दौरान विपक्षी सांसदों ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने ज्ञापन सौंपने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की।

विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं ने इस आंदोलन को लोकतंत्र की रक्षा के रूप में प्रस्तुत किया। अखिलेश यादव ने कहा कि सरकार प्रदर्शन स्थल बदलकर खुद को नहीं बचा सकती और लोकतंत्र के लिए संघर्ष जारी रहेगा। तेजस्वी यादव, नेहा बोरा और अन्य कई सांसदों ने भी इस बात पर ज़ोर दिया कि यह केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि सिद्धांतों की लड़ाई है।

राहुल गांधी की कानूनी टीम ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा, क्योंकि वे चुनाव आयोग में alleged गड़बड़ी और CEC के खिलाफ उठाए गए मुद्दों को अदालत में पेश करना चाहते हैं। विपक्षी सांसदों ने 6, 7, 8 और 9 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और SIR के विरोध में कई प्रदर्शन किए, जिनमें राहुल और प्रियंका गांधी को तीन बार पुलिस ने हिरासत में लिया।

इन घटनाओं के दौरान कई सांसदों ने सार्वजनिक मंचों पर अपने विचार रखे। कांग्रेस के सांसदों ने कहा कि यह प्रदर्शन मार्च नहीं, बल्कि सिद्धांतों की लड़ाई है, जबकि समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव ने इसे पूरे देश की मांग बताया। राजद के मनोज झा ने कहा कि पिटीशन पहले भी फाइल हुई है और चीफ जस्टिस सब जानते हैं।

पुलिस ने इन प्रदर्शनियों पर कड़ी निगरानी रखी और कई बार विरोधियों को हिरासत में लिया। हालांकि, सुरक्षा कारणों से बंद किए गए मेट्रो स्टेशनों के एंट्री-एग्जिट गेट फिर से खोल दिए गए, जिससे जनता की आवाज़ सुनी जा रही है। विपक्षी नेताओं ने कहा कि सरकार प्रदर्शन स्थल बदलकर गड़बड़ियों को छिपा नहीं सकती और लोकतंत्र को बचाने के लिए संघर्ष जारी रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि कोर्ट का उपयोग राजनीति के रणक्षेत्र के रूप में नहीं किया जा सकता और सभी पक्षों को साक्ष्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई भी आम नागरिक या निर्वाचित प्रतिनिधि याचिका दाखिल कर सकता है, और अदालत कानून के अनुसार कार्रवाई करेगी।

विपक्षी दलों ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता का प्रतीक बताया, जबकि केंद्र सरकार और भाजपा के नेता ने इसे कांग्रेस के संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार हमलों का परिणाम कहा। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कांग्रेस की हार का कारण उसकी विचारशून्य नेतृत्व है, न कि चुनाव आयोग।

इन घटनाओं का सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव स्पष्ट है। कई शहरों में सुरक्षा उपाय बढ़ाए गए, सार्वजनिक परिवहन में व्यवधान आया और जनता के बीच राजनीतिक जागरूकता में वृद्धि हुई। विरोध के दौरान विभिन्न सामाजिक समूहों ने भी अपनी आवाज़ उठाई, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी का स्तर बढ़ा।

अंत में, यह स्पष्ट है कि विपक्ष का यह मार्च और सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाएँ भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं को उजागर कर रही हैं। आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि न्यायालय कैसे निर्णय लेता है और चुनाव आयोग तथा सरकार इस दबाव का कैसे जवाब देती है। यदि कोर्ट समय सीमा बढ़ाकर याचिकाओं की सुनवाई करता है, तो यह प्रक्रिया आगे भी जारी रह सकती है, जिससे राजनीतिक माहौल में और अधिक तनाव और संवाद दोनों ही उत्पन्न हो सकते हैं।

📡 स्रोत: Dainik Bhaskar

💡 पृष्ठभूमि (Background)

राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य नेता चुनाव आयोग के चेयरमैन ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक बड़े मार्च की तैयारी कर रहे हैं। यह कदम विपक्ष के बीच एकजुटता का प्रतीक है और चुनावी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाता है। यदि कोर्ट में मुकदमा सफल होता है, तो यह चुनाव आयोग के कार्यों में बदलाव ला सकता है, जिससे चुनावी नियमों और निरीक्षण पर सार्वजनिक विश्वास प्रभावित हो सकता है।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan वॉयस ऑफ क्रांति के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।