Xप्लेन: 113 देशों में मृत्युदंड खत्म, भारत की SC ने क्यों कहा- 'हैंगिंग' संविधान के दायरे में

सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सज़ा देने के लिए फांसी के तरीके को खत्म करने से इनकार कर दिया है, लेकिन कहा है कि अगर नए वैज्ञानिक या मेडिकल सबूतों से पता चलता है कि किसी दूसरे तरीके से कम दर्द होता है, तो इस मामले पर फिर से विचार किया जा सकता है.
कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार एक एक्सपर्ट पैनल बना सकती है जो यह जांच करे कि क्या मौत की सज़ा देने का कोई दूसरा तरीका दर्द कम कर सकता है और मौत की सज़ा पाए कैदियों की गरिमा की रक्षा कर सकता है. मौत की सज़ा के लिए फांसी के तरीके के खिलाफ याचिका क्यों दायर की गई थी?
ANI न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, यह याचिका सीनियर वकील ऋषि मल्होत्रा ने दायर की थी. उन्होंने उस कानून को चुनौती दी थी जिसके तहत मौत की सज़ा फांसी देकर दी जाती है. क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 354(5) में कहा गया है कि मौत की सज़ा पाए व्यक्ति को "तब तक गर्दन से लटकाया जाए जब तक उसकी मौत न हो जाए."
मल्होत्रा की याचिका में फांसी की जगह दूसरे तरीकों, जैसे कि ज़हरीला इंजेक्शन, गोली मारना, बिजली का झटका देना या गैस चैंबर का इस्तेमाल करने की मांग की गई थी.
उन्होंने तर्क दिया कि फांसी से लंबे समय तक दर्द और तकलीफ़ हो सकती है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति के गरिमा के साथ मरने के अधिकार का उल्लंघन है. यह याचिका 2017 में दायर की गई थी.
सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी विचार किया था कि क्या मौत की सज़ा देने के दूसरे तरीकों की जांच के लिए कोई एक्सपर्ट पैनल बनाया जाना चाहिए. लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2023 में कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर.
वेंकटरमणी से फांसी देने से होने वाली तकलीफ, मौत होने में लगने वाले समय और इस तरीके से जुड़े दूसरे मुद्दों पर जानकारी इकट्ठा करने को कहा था. बाद में अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने मौत की सज़ा देने के बेहतर तरीकों की जांच के लिए एक एक्सपर्ट पैनल बनाने की सिफारिश की थी.
सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सज़ा को खत्म करने से इनकार क्यों किया? </
📡 स्रोत: ABP Live