Xप्लेन: नेपाल में 6.3% हिरोशिमा बम जितना ताकतवर ग्लेशियर 4,000 फीट नीचे कैसे गिरा? पढ़ें बैकस्टोरी

26 अगस्त 2026 की सुबह 8:37 बजे... नेपाल की राजधानी काठमांडू से महज 45 किलोमीटर उत्तर में 23,733 फीट ऊंचे लांगटांग लिरुंग पर्वत से एक ऐसी घटना शुरू हुई, जिसने कुछ ही घंटों में नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती इलाकों में कोहराम मचा दिया.
करीब 2,000 फीट चौड़ा यानी आधा किलोमीटर से भी बड़ा ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा अचानक टूटा. करीब 4,000 फीट नीचे घाटी में जा गिरा. यह गिरावट इतनी जबरदस्त थी कि इसने 5.2 तीव्रता का भूकंप जैसा कंपन पैदा कर दिया.
इतना तेज कि अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण (USGS) ने पहले इसे भूकंप समझ लिया था. हालांकि, यह भूकंप नहीं था. यह खुद ग्लेशियर का ढहना था जिसने भूकंपीय तरंगें पैदा कीं. इसके बाद जो हुआ, वह शब्दों में बयान करना मुश्किल है... इस तबाही की शुरुआत आखिर हुई कैसे? सब कुछ लांगटांग लिरुंग पर्वत की उत्तरी ढलान पर शुरू हुआ.
गूगल अर्थ, प्लैनेट लैब्स और नेपाल के नैचुरल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDRRMA) की सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि यह इलाका भारी ग्लेशियर से ढका हुआ है. करीब 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर का निचला हिस्सा अचानक अलग हो गया और सीधे 4,000 फीट नीचे घाटी में जा गिरा.
चीन के @ALXE141 यूजर ने तस्वीर शेयर करते हुए बताया कि ग्लेशियर का यह हिस्सा टूटकर गिरा होगा. इस गिरावट की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इससे पैदा हुई ऊर्जा हिरोशिमा परमाणु विस्फोट की करीब 6.3 प्रतिशत बताई जा रही है. यह इतनी जबरदस्त थी कि USGS ने शुरू में इसे 4.4 तीव्रता का भूकंप रिकॉर्ड किया.
बाद में गहराई से जांच करने पर पता चला कि यह भूकंप नहीं बल्कि ग्लेशियर के ढहने से पैदा हुआ कंपन था, जिसकी तीव्रता 5.2 थी. यानी यह कोई भूकंप नहीं था जिसने हिमस्खलन को ट्रिगर किया, बल्कि हिमस्खलन ने ही भूकंप जैसा कंपन पैदा किया.
रसुवाको भोटेकोशी नदीमा बाढी आउनुपूर्व र आएपछि स्याफ्रुबेसीदेखि देविघाटसम्मका स्याटेलाइट तस्विर। PlanetLab का यी तस्विरहरु Stimson Center को सहयोगमा प्राप्त भएका हुन्। तस्विर १-देविघाट क्षेत्र, तस्विर २-बेत्रावती क्षेत्र तस्विर ३-हाकु बेसी क्षेत्र, तस्विर ४-स्याफ्रुबेसी क्षेत्र pic.twitter.com/syQ90n9JE6
— NDRRMA (@NDRRMA_Nepal) August 26, 2026 ग्लेशियर से सुनामी तक कैसा रहा सफर? जब बर्फ और चट्टानों का यह विशाल ढेर घाटी में गिरा, तो उसने ल्हेन्डे खोला नदी को पूरी तरह से ब्लॉक कर दिया. यह भोटे कोशी नदी की सहायक नदी है. इससे एक प्राकृतिक बांध बन गया, जिसके पीछे पानी तेजी से इकट्ठा होने लगा.
यह बांध ज्यादा देर टिक नहीं सका. ग्लेशियर के गिरने से पैदा हुई गर्मी ने बर्फ के एक बड़े हिस्से को तुरंत पिघला दिया. नदी का पानी, मिट्टी और चट्टान के टुकड़ों से मिलकर एक भयानक मंजर बन गया.
@theiaincameron ने बताया कि ग्लेशियर का टुकड़ा लुढ़कता हुआ नदी तक कैसे आया होगा. जब यह बांध टूटा, तो जो निकला वह सिर्फ पानी नहीं था. यह कीचड़, चट्टानें, बर्फ और मलबे का एक घातक तूफान था. एक्सपर्ट्स ने इसे 'लिक्विड कंक्रीट' जैसा बताया है.
इतना भारी और तेज कि इसे कोई नहीं रोक सकता था. 100 फीट ऊंची इस सुनामी जैसी लहर ने ल्हेन्डे खोला, भोटे कोशी और फिर त्रिशूली नदी के रास्ते खड़ी पहाड़ियों से होकर नीचे दौड़ना शुरू किया. तबाही का मंजर कितना भयानक है? इस बाढ़ ने सब कुछ बहा दिया.
तिब्बत की ओर जाने वाले ग्यिरोंग बॉर्डर पोस्ट के वीडियो में लोग अपनी जान बचाने के लिए भागते नजर आ रहे हैं, जबकि मलबे की दीवार इमारतों को ढहाती हुई और बसों की कतारों को बहाती हुई आ रही है.
Devastating flash flood hits Nepal’s Rasuwa district 💔 Lives lost. Hundreds still missing including Indian tourists and Kailash pilgrims. Bridges and roads washed away. Rescue teams working through the day. May Mahadev protect everyone. 🙏#Nepal pic.twitter.com/7PlVpr2zNo — SUNITA (@SaffronSunita) August 26, 2026
अस्पताल में भर्ती 68 साल के केशव प्रसाद बराल ने द गार्जियन को बताया, 'कीचड़ का एक बड़ा झोंका सीधे हमारी तरफ आ रहा था. जैसे-जैसे ये करीब आता गया, ये और ऊंचा होता गया. जब मैंने इसे हमारे घर में आते देखा, तो मैंने अपनी पत्नी का हाथ पकड़ने की कोशिश की और उसे छत पर ले जाना चाहा, लेकिन कीचड़ उसे बहा ले गया.
चार-पांच घंटे बाद एक हेलीकॉप्टर मुझे बचाने आया, लेकिन मेरी पत्नी अब भी कहीं कीचड़ के नीचे दबी है.' एक और बचे हुए व्यक्ति ने बताया कि एक आम के पेड़ को पकड़कर उसकी जान बची, जबकि जिस मकान में वह काम कर रहा था, वह पूरी तरह गायब हो गया. बिदुर में एक मजदूर बिबेक कुमाल ने द गार्जियन को बताया, 'मैं दौड़ने लगा.
फिर पानी की एक दीवार ऐसे गरजती हुई आई जैसे भूकंप आया हो. मुझे कीचड़ और मलबे के बीच बहा ले गया, लेकिन किस्मत से मैं एक आम के पेड़ पर फंस गया. अगर वो पेड़ नहीं होता, तो मैं बहकर मर जाता.' कीचड़ और मलबे में दबे घर नुकसान का आंकड़ा कितना बड़ा है? यह त्रासदी इतनी बड़ी है कि आंकड़े भी साफ नहीं हो पा रहे हैं.
नेपाल पुलिस ने 157 शव बरामद करने की पुष्टि की है, जबकि कुल मृतक संख्या कम से कम 160 बताई जा रही है. करीब 826 लोग लापता हैं. इनमें भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा समेत दो दर्जन देशों के 579 पर्यटक शामिल हैं. तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी में चीनी मीडिया के मुताबिक, 558 लोग लापता हैं.
कुछ रिपोर्ट्स में लापताओं की संख्या 1,000 से भी ज्यादा बताई जा रही है. बाढ़ ने लांगटांग ट्रेकिंग रूट का शुरुआती पॉइंट स्याब्रुबेसी को तबाह कर दिया है. साथ ही कैलाश मानसरोवर की हिंदू तीर्थयात्रा पर जाने वाले यात्रियों के रास्ते भी बर्बाद हो गए.
नेपाल के रसुवा जिले में करीब 13 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट प्रभावित हुए हैं, जबकि 9 बैंकों की शाखाएं बह गईं और 26 कर्मचारी अब भी लापता हैं. तो आखिर पहाड़ क्यों ढह रहे हैं? यह सिर्फ एक घटना नहीं है, बल्कि यह एक बड़े बदलाव का संकेत है. हिमालय का हिंदू कुश क्षेत्र दुनिया के औसत से कहीं ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है.
संयुक्त राष्ट्र (UN) की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल की बर्फ से ढकी चोटियों ने पिछले 30 साल में अपनी करीब एक-तिहाई बर्फ खो दी है. पिछले एक दशक में ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार पिछले दशक के मुकाबले 65 प्रतिशत तेज हो गई है.
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के मुताबिक, पूरे हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन और सूखे की आमद और तीव्रता दोनों बढ़ रही है.
नेपाल में अकेले 47 ग्लेशियर ऐसी झीलें हैं जो कभी भी फट सकती हैं. इन्हें 'टाइम बम' कहा जा रहा है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि हिमालय का भूगर्भीय ढांचा पहले से ही अस्थिर है. भारतीय और यूरेशियन प्लेटें अब भी टकरा रही हैं. इससे हिमालय हर साल 40-50 मिलीमीटर ऊपर उठ रहा है.
इस अस्थिर भूभाग पर जब ग्लोबल वार्मिंग का असर जुड़ता है, तो ऐसी घटनाएं और भी बार-बार होने वाली हैं. नेपाल के लिए बड़ा सबक यह त्रासदी 2015 के 7.8 तीव्रता वाले भूकंप की याद दिलाती है, जब लांगटांग लिरुंग की दक्षिणी ढलान से आए हिमस्खलन में करीब 300 लोग मारे गए थे. अब एक बार फिर यही पहाड़ तबाही की वजह बना है.
बाढ़ का पानी इतना तेज और भारी था कि मलबा करीब 200 किलोमीटर दूर नारायणी नदी तक पहुंच गया. नेपाल सरकार और NDRRMA ने राहत और बचाव कार्य तेज कर दिए हैं. सवाल यह है कि क्या हम आने वाली ऐसी और घटनाओं के लिए तैयार हैं? बढ़ता तापमान, पिघलते ग्लेशियर और बढ़ती अस्थिरता मिलकर हिमालय को एक खतरनाक क्षेत्र बना रहे हैं.
📡 स्रोत: NewsData.io