जिस यमन ने दुनिया को दी मोचा कॉफी, अब वहां बदहाली और बारूद की गंध
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यमन के मोखा बंदरगाह, जिसने अपनी कॉफी से दुनिया बदल दी, सोच बदल दी और समाज को बदल दिया. वह मोखा आज उजड़ा हुआ, बिखरा हुआ और बदहाल हालत में है.
मोखा जिसने कॉफी को व्यापार बनाकर पूरी सदी तक अपने पास थामे रखा, आज वहां कॉफी की महक नहीं बारूद की बू आती है. इस बंदरगाह से कॉफी क्या गई, पूरा शहर और यहां तक कि पूरा यमन बर्बाद हो गया. कहानी मोचा कॉफी और मोखा बंदरगाह की
आज जो हम मोचा कॉफी पीते हैं वो इसी मोखा बंदरगाह की देन है, इसी बंदरगाह के नाम पर है. दरअसल मोखा से मिलने वाली बीन्स में चॉकलेट जैसा स्वाद माना जाता था.
बाद में अमेरिका और यूरोप में चॉकलेट मिली कॉफी को ही मोचा कहने का चलन हो गया. 17वीं सदी में कॉफी मध्य पूर्व से यूरोप पहुंची.
लंदन, पेरिस, विएना के कॉफी हाउसों में मोचा का स्वाद जैसे ही लोकप्रिय हुआ, ये जगहें सिर्फ पीने की नहीं, बातचीत और विचार-विमर्श की भी जगहें बन गईं थीं. लंदन में इन्हें पेनी यूनिवर्सिटी कहा जाता था.
एक पैसे की कॉफी में अखबार, गप और बहस मिल जाती थी. अमेरिका में स्वतंत्रता की बातें भी कॉफी घरों में पकती रहीं. चाय ब्रिटिश कर का प्रतीक बन गई, और कॉफी विद्रोह का पेय. समृद्ध हुआ करता था यमन
आज तस्वीरों में उजड़ा हुआ, जंग में घिरा हुआ, वीरान गलियां, धूल से सने मकान, समुद्र किनारे खड़े बंद जहाजों वाला यमन एक समय इसी कॉफी के कारण समृद्ध हुआ करता था. यह वही यमन है जहां की मिट्टी ने दुनिया को कॉफी सिखाई थी.
मोखा नाम का कप तक इस शहर से दुनिया तक पहुंचा. इस बंदरगाह के पहाड़ों से हवा उतरती थी तो उसमें भुनी फलियों की गंध होती थी. मोखा के बाजार में व्यापारी बैठे होते, कप छनते, बातें चलतीं.
लाल सागर की नमी में कॉफी की तीखी, थोड़ी चॉकलेट जैसी खुशबू तैरती रहती. वह महक सिर्फ रसोई की नहीं थी. वह व्यापार की थी, इबादत की थीऔर भर रात जागने वालों की थी. सोलहवीं सदी में ओटोमन तुर्क आए.
उन्होंने छोटे से गांव को बंदरगाह बना दिया. पहाड़ों में कॉफी बड़े पैमाने पर उगाई जाने लगी. कॉफी के बीज बाहर न जा सकें, इसलिए उन्हें उबालकर या भूनकर ही भेजा जाता था.
एक सौ साल से ज्यादा दुनिया की कॉफी का रास्ता यहीं से निकला.
कई सारी यूरोपीय कंपनियां आईं जैसे- अंग्रेज और डच आदि, उन्होंने यमन से खरीदी कॉफी की हर फली पर एक ही ठप्पा लगाया 'मोचा कॉफी'. इस तरह से शहर का नाम ही पेय का नाम बन गया
मोचा कॉफी इथियोपिया से होते हुए पूरी दुनिया तक इसी मोखा बंदरगाह से पहुंची थी.
मोखा लाल सागर तट पर है, बाब-अल-मंदेब के पास ,जिसे अफ्रीका, अरब सागर, हिंद महासागर और आगे भूमध्यसागर का चौराहा कहा जाता है.
पहाड़ों से ऊंटों पर बीन्स तटीय मंडियों तक आतीं थी, फिर मोखा या हुदैदा से जहाजों पर चढ़ती थीं. वहाँ से जेद्दा, स्वेज नहर और काहिरा होते हुए दुनिया भर में जाती थी. यूरोपीय कंपनियां यहीं दुकान लगाती थीं.
जो भी बोरी यहां से निकलती, उस पर एक ही नाम बैठ जाता मोखा कॉफी.
अंदर की फसल यमन की हो या पुराने रास्ते यानी इथियोपिया से जुड़ी हो, दुनिया उसे इसी बंदरगाह के नाम से जानती थी. लाख कोशिशों के बावजूद बाहर चले गए कॉफी के पौधे
यहां के व्यापारियों और शासकों ने उपजाऊ बीजों को बाहर नहीं जाने से रोकने के लिए हर संभव प्रयास किया. वे कॉफी की बीन्स को भूनकर या उबालकर ही बेचते थे, ताकि दूसरा देश खुद न उगा सके.
इसी एकाधिकार ने मोखा को करीब सौ-डेढ़ सौ साल दुनिया का अकेला बड़ा कॉफी दरवाजा बना दिया. लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद कॉफी के पौधे यहां से निकलकर पूरी दुनिया तक पहुंच गए.
फिर दुनिया को कॉफी की इस खान की जरूरत नहीं महसूस हुई और यहां के विद्रोहियों और दुनिया ताकतवर मुल्कों ने मिलकर इस शहर और देश दोनों को बारूद के ढेर पर छोड़ दिया.
📡 स्रोत: NewsData.io