यासीन मलिक ने अपने लिए फांसी मांगी:कश्मीरी पंडित सरला भट मर्डर केस आगे नहीं लड़ेंगे; हलफनामे में लिखा- पत्नी को तलाक देंगे
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जेल में बंद प्रतिबंधित जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) चीफ मोहम्मद यासीन मलिक ने कश्मीरी पंडित महिला की हत्या के मामले में अपनी भूमिका से इनकार किया है। यासीन ने 25 पेज का हलफनामा दायर किया है, जिसमें उन्होंने कोर्ट से अपने लिए फांसी की मांग की है। यासीन मलिक फिलहाल तिहाड़ जेल में बंद हैं।
उन पर सरला भट की हत्या का आरोप है। हालांकि मलिक ने खुद को बेगुनाह बताया है, लेकिन केस लड़ने से इनकार करते हुए मौत की सजा की मांग की है। उन्होंने दावा किया कि उन पर लगे आरोप असली पुलिस जांच के बजाय मनगढ़ंत कहानी जैसे लगते हैं। यह केस उन्हें फंसाने के लिए दशकों बाद बनाया गया था।
मलिक का यह हलफनामा तब आया है जब स्टेट इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी (SIA) ने 29 जून को सरला भट की हत्या के मामले में चार्जशीट दाखिल की। पत्नी को भी तलाक देने की बात लिखी 60 साल के मलिक ने हलफनामे में अपनी पत्नी मुशाल हुसैन से शादी खत्म करने का फैसला भी बताया।
उन्होंने कहा कि इसकी वजह लंबी कैद और पिछले 8 साल से परिवार से बातचीत न कर पाना है। यासीन ने कहा कि उन्हें फोन कॉल या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा नहीं दी गई। मलिक ने हलफनामे में अपनी पत्नी के लिए लिखा, "फांसी पर चढ़ने से पहले, मैंने हमारे निकाह के बंधन से तुम्हें अलग करने का फैसला किया है।
मैं नहीं चाहते कि तुम अपनी बाकी जिंदगी मेरे हालात का बोझ ढोते हुए, विधवा बनकर बिताओ।" मलिक ने अपनी बेटी रजिया सुल्ताना को सलाह दी कि वह हर दिन 5 मिनट के लिए अपने दादा-दादी से बात करे। उन्होंने लिखा है- "मेरी डेथ सेल (मौत की कोठरी) में सिर्फ मैं और तुम्हारी तस्वीर है।
तुम्हारी तस्वीर के जरिए, मुझे दिन के चौबीसों घंटे तुम्हारे साथ होने का एहसास होता है।" यासीन के हलफनामे में लिखी बड़ी बातें…
📡 स्रोत: Dainik Bhaskar
💡 पृष्ठभूमि (Background)
यह खबर जम्मू‑कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के प्रमुख मोहम्मद यासीन मलिक के फांसी की मांग के बारे में है, जो कश्मीरी पंडित सरला भट की हत्या के मामले में अपनी भूमिका से इनकार करते हुए 25 पृष्ठ का हलफनामा दायर कर चुके हैं। यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्षेत्रीय संघर्ष और न्याय व्यवस्था के बीच जटिल संबंधों को उजागर करता है, तथा एक प्रमुख उग्रवादी नेता के कानूनी दावे पर प्रकाश डालता है। आम जनता पर इसका असर गहरा हो सकता है—यह कानून के सामने सभी को बराबर मानने की आवश्यकता पर बल देता है, साथ ही