यौन उत्पीड़न केस में टीचर को राहत, SC बोली- 'एक शिक्षक पर हमेशा के लिए..'
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शिक्षक को लेकर हुई एफआईआर पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज केस में सुनवाई हुई. इसमें आरोप लगाया गया था कि उसने क्लास में कई छात्राओं को गलत तरीके से छुआ था.
इसमें पीठ पर हाथ रखना, कमर को टच करना जैसे गंभीर आरोप शामिल थे.
आरोप के सामने आने के बाद पुलिस ने टीचर्स के खिलाफ पॉक्सो एक्ट 2012 की धारा 10 के तहत केस दर्ज किया.
इन्हीं आरोपों की लड़ाई में जुटे टीचर ने पहले हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, इसके बाद जब वहां से निराशा मिली तो वह सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर न्याय की गुहार लगाने पहुंचे.
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'शारीरिक सजा देने का उनका तरीका भले ही गलत और असंवेदनशील रहा हो, लेकिन इससे यौन मंशा का पता नहीं चलता है.
कोर्ट ने कहा है कि बाद में बरी हो जाने पर भी मुकदमे से हुए नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती है. एक टीचर पर हमेशा के लिए दाग लग जाएगा.'
जस्टिस भुइयां और जस्टिस अतुल एस की बेंच ने की सुनवाई
इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया था.
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुइयां और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की बेंच इस मामले में सुनवाई कर रही थी. उनके तहत पॉक्सो की धारा 10 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी. महिला टीचरों ने हेडमास्टर से टीचर की शिकायत की थी.
तब आरोप लगाया था कि उन्होंने 10वीं कक्षा की कुछ छात्राओं के शरीर को छुआ. इसके बाद बाल जिला संरक्षण इकाई ने स्कूल का दौरा किया, और जांच रिपोर्ट बनाई. फिर पूरे मामले में पुलिस ने संज्ञान लेते हुए, एफआईआर दर्ज की.
शिक्षक ने हाईकोर्ट में इस FIR को रद्द करने की मांग की, और याचिका दाखिल की थी. लेकिन उसे कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया. इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां माननीय सर्वोच्च अदालत ने रोक लगा दी.
बाल संरक्षण इकाई ने क्या बताया?
बाल संरक्षण इकाई ने बताया था कि छात्राओं ने कहा है कि जब वे क्लास में ध्यान नहीं देती थीं, तो टीचर उनकी पीठ के ऊपरी हिस्से पर मारते थे.
ऐसे में वह जिस तरह स
📡 स्रोत: ABP Live
💡 पृष्ठभूमि (Background)
यह खबर एक शिक्षक पर यौन उत्पीड़न के आरोप और सुप्रीम कोर्ट द्वारा पोक्सो एक्ट के तहत राहत देने के फैसले के बारे में है। यह विषय शिक्षा क्षेत्र में लैंगिक सुरक्षा और कानून के लागू होने के महत्व को दर्शाता है। इस निर्णय की अहमियत यह है कि यह स्पष्ट करता है कि शिक्षक भी कानूनी प्रक्रियाओं के तहत दोषमुक्त हो सकते हैं यदि साक्ष्य पर्याप्त न हो। आम जनता पर इसका असर यह हो सकता है कि शिक्षा प्रणाली में विश्वास बढ़े और साथ ही पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी जागरूकता में वृद्धि हो।